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मेवात में सूख गए प्राकृतिक जलाशय, पहाड़ियों के बांधों में भी नहीं बचा पानी

Wed, 04 May 2016 07:25 AM IST
राजुद्दीन जंग/अमर उजाला, गुड़गांव
राजुद्दीन जंग/अमर उजाला, गुड़गांव Updated Wed, 04 May 2016 07:25 AM IST
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Mewat dried natural reservoir in the hills not save water in dams
सूखे पहाड़ियों के बांध

प्राकृतिक जल संसाधनों से छेड़छाड़ इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। मेवात क्षेत्र में 112 प्राकृतिक जलाशय बिल्कुल सूख चुके हैं। अरावली की पहाड़ियों में स्थित तीन प्राकृतिक तालाबों में भी एक बूंद पानी नहीं बचा है।

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दूरदराज से अरावली पहाड़ियों में चरने आने वाली भेड़, बकरियों, गायों के लिए पानी पहाड़ों के आसपास कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा। पहाड़ों पर चढ़कर पता चलता है कि आसपास बने बरसाती तालाब और बांधों में मिट्टी की दरारें बन चुकी हैं।
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नगीना और नूंह के कई गांवों से मिलकर बनी बड़ी प्राकृतिक झील कोटला भी पानी के लिए तरस रही है। जल विभाग की मानें तो बरसात कम हुई इसलिए जलाशय जल्दी सूख गए। 
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जलवायु परिवर्तन के चलते अकाल जैसी स्थिति मेवात में पैदा हो गई है। काला पहाड़ पर चढ़ने के बाद पता चला कि दादा मौजी का कदबताल नामक तालाब भी सूख गया है। इसके चारों तरफ खड़े 36 कदंब के पेड़ जरूर हरे-भरे दिखाई देते हैं। कदबताल घागस गांव की पहाड़ियों पर करीब पांच किलोमीटर दूर पड़ता है। 

मेवाती जलयोद्धा के नाम से मशहूर मरहूम भूरे खां का भौंड़ गांव की पहाड़ी पर बना तालाब भी सूख चुका है। हाजी हनीफ (80) बताते हैं कि कंसाली, घागस, नोटकी, कोटला, शाहपुर, फखरपुरखारी, नांगल, झिमरावट में बने कुदरती जलाशयों में पानी नहीं रहा।

 ऐसा पहली बार देखने को मिला जब मई शुरू होने से पहले ही ये सूख गए हैं। याकूब फौजी (65) ने बताया कि प्रकृति के साथ हो रही छेड़छाड़ जल स्रोतों पर भारी पड़ी है। इसलिए बरसात भी कम हुई। पहाड़ों के आसपास बसे ग्रामीण अपने पशुधन को बचाने में लगे हैं।

इधर एनजीओ एसएम सहगल फांउडेशन एवं एमडीए के सहयोग से जिलेभर में बने 42 चैकडेम में से तीन में ही थोड़ा पानी बचा है। इनमें जलालपुर, सांठवाड़ी और बड़ौजी शामिल हैं। सहगल फांउडेशन के जल अधिकारी जाफर हुसैन ने कहा कि जिले में बने प्राकृतिक जलाशयों के सूखने का कारण जल प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम न होना है। 


जो 42 बांध सहगल फांउडेशन ने खुद व अन्य अभिकरण के सहयोग से बनाए उनमें से तीन में पानी बचा है। वन अधिकारी सुनील जैन ने बताया कि प्राकृतिक संसाधनों को संजोने के लिए गांव झिमरावट और झिरमंदिर के नजदीक करोड़ों की लागत से चैकडेम बनाए गए हैं। उनका कहना है कि बांधों की मुंडेर पर पौधे लगाए जाएं। ताकि सूरज की किरणें सीधे पानी पर न पडे़।

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