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जहां हुआ अंधेरा, वहीं बनाया बसेरा, प्रचार के लिए निकलने पर कई सप्ताह तक नहीं लौट पाते थे घर
Sat, 30 Mar 2019 07:37 AM IST
पूजा त्रिपाठी
मनोज कुमार, अमर उजाला, नोएडा
मनोज कुमार, अमर उजाला, नोएडा
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Sat, 30 Mar 2019 07:37 AM IST
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यूपी के पूर्व सीएम बाबू बनारसी दास
- फोटो : सोशल मीडिया
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लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा जब भी प्रत्याशी घर से निकलते थे तो पता नहीं रहता था कि वह कितने दिन में लौटेंगे थे। जो जिस गांव में जाता वहीं खाना खाते और सो जाते थे।
खर्च भी कुछ नहीं होता था। उल्टा गांव देहात के लोग ही नेताओं को खर्च के लिए रुपये देते थे। उन्हीं में थे यूपी के मुख्यमंत्री रहे बाबू बनारसी दास। बोड़ाकी गांव के कालूराम भाटी (मुंशी जी) बताते हैं कि 3 दशक पहले पैसा सब कुछ नहीं होता था।
1970 में कई ऐसे नेता थे जो पैदल ही गांवों में वोट मांगते थे। जहां रात हो जाती, वहीं ठहर जाते थे। अगले दिन फिर उसी गांव से प्रचार शुरू कर देते थे। इस तरह के नेताओं में बाबू बनारसी दास, रामचंद्र विकल थे।
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उस समय साधन नहीं थे और नेता भी सच्चे होते थे। जो वादा करते थे उन्हें हर हाल में पूरा करते थे। अब साधन हो गए हैं। सुबह निकलकर प्रत्याशी शाम को घर पहुंच जाते हैं।
गांव में रात रुकने के बाद पता चल जाता था कि ग्रामीणों की मूल और सबसे बड़ी समस्या क्या है। जब स्वयं समस्याओं से दो चार होते थे तो उन्हें याद रहता था और परेशानियों को दूर भी कराते थे।
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खर्च भी कुछ नहीं होता था। उल्टा गांव देहात के लोग ही नेताओं को खर्च के लिए रुपये देते थे। उन्हीं में थे यूपी के मुख्यमंत्री रहे बाबू बनारसी दास। बोड़ाकी गांव के कालूराम भाटी (मुंशी जी) बताते हैं कि 3 दशक पहले पैसा सब कुछ नहीं होता था।
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1970 में कई ऐसे नेता थे जो पैदल ही गांवों में वोट मांगते थे। जहां रात हो जाती, वहीं ठहर जाते थे। अगले दिन फिर उसी गांव से प्रचार शुरू कर देते थे। इस तरह के नेताओं में बाबू बनारसी दास, रामचंद्र विकल थे।
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उस समय साधन नहीं थे और नेता भी सच्चे होते थे। जो वादा करते थे उन्हें हर हाल में पूरा करते थे। अब साधन हो गए हैं। सुबह निकलकर प्रत्याशी शाम को घर पहुंच जाते हैं।
गांव में रात रुकने के बाद पता चल जाता था कि ग्रामीणों की मूल और सबसे बड़ी समस्या क्या है। जब स्वयं समस्याओं से दो चार होते थे तो उन्हें याद रहता था और परेशानियों को दूर भी कराते थे।