अचानक भाजपा में शामिल नहीं हुए गौतम, पहले से कर रहे थे 'गंभीर' प्लानिंग
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गौतम गंभीर ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है और अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर दी है। लेकिन यह सब अचानक से नहीं हुआ, वह बहुत लंबे समय से इसके बारे में विचार कर रहे थे। गंभीर ने अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच 2016 में राजकोट में खेला था और उसके तुरंत बाद दिए एक साक्षात्कार में इस बात के संकेत दे दिए थे कि वो देर-सबेर राजनीतिक पारी खेलेंगे।
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद जब एक साक्षात्कार में उनसे राजनीति में आने के बारे में पूछा गया था तो उनका कहना था कि 'यदि मुझे मौका मिला तो मैं राजनीति में जाऊंगा लेकिन रबर स्टैम्प नहीं बनूंगा।' इसके बाद से ही उनकी राजनीतिक पारी को लेकर बीच-बीच में खबरें आती रहीं हैं। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी उन्होंने देश के कई बड़े मुद्दों और समस्याओं पर सोशल मीडिया और अन्य तरीके से अपनी प्रतिक्रियाएं रखीं और लोगों के जहन में अपनी एक अलग छवि तैयार की। भारतीय सेना और सैनिकों से जुड़े मुद्दों पर वह हमेशा से ही बोलते रहे हैं।
यही नहीं छत्तीसगढ़ के सुकमा में जब नक्सली हमला हुआ था, तब उन्होंने 25 शहीद जवानों के बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाने की बात कही थी। इसके अलावा असम में शहीद सीआरपीएफ के जवान दिवाकर दास के बेटे की शिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी भी उन्होंने अपने ऊपर ले लीं थीं। जम्मू-कश्मीर में भी शहीद हुए पुलिस अफसर अब्दुल राशिद की बेटी की भी शिक्षा का खर्चा उठाने का एलान उन्होंने किया था।
वो 'गौतम फाउंडेशन' के नाम से एक संस्था का संचालन करते हैं, जिसके माध्यम से बच्चों की मदद की जाती है। सामाजिक कार्यों में उनकी भागेदारी हमेशा ही उनके राजनीति में उतरने की अटकलों को बल देती रही। लेकिन ऐसा नहीं कि वो सिर्फ सामाजिक कार्यों के कारण ही चर्चा में रहते हों और भी कई मुद्दे हैं जिन पर राय रखने के बाद वो मीडिया की सुर्खियां बने। पूर्व क्रिकेटर और पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान जाने को लेकर उन्होंने साफ कहा था कि इस तरह का काम कर लोगों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए।