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सराहनीय: इस शख्स ने कोविड काल में अपने पैतृक गांव में की पुस्तकालय बनाने की छोटी सी कोशिश, आज दायरा सात राज्यों में फैला

Mon, 04 Jul 2022 05:50 AM IST
विजय पुंडीर राजीव कुमार, नई दिल्ली
राजीव कुमार, नई दिल्ली Published by: विजय पुंडीर Updated Mon, 04 Jul 2022 05:50 AM IST
सार

कोविड काल में राष्ट्रीय मनवाधिकार आयोग में तैनात लाल बहार ने अपने पैतृक गांव में पुस्तकालय बनाने की छोटी सी कोशिश की। आज उसका दायरा सात राज्यों में फैल चुका है। लाल बहार के गाजियाबाद के लोनी स्थित गनौली के रहने वाले हैं। 

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Lal Bahar made a small effort to build a library in his native village Ganauli during covid period whose scope spread in seven states
पुस्तकालय बनाने वाली ग्राम पाठशाला की टीम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हरिवंश राय बच्चन ने खूब कहा... 'मंजिल मिले ना मिले, यह तो मुकद्दर की बात है। हम कोशिश ही ना करें, यह तो गलत बात है...। जरा सोचिए, अगर देश को आजाद कराने की कोशिश ही नहीं की गई होती तो क्या हम और आप आज आजाद होते? अगर थॉमस अल्वा एडिसन ने बल्ब जलाने की कोशिश ही नहीं की होती तो क्या आज सारी दुनिया ऐसे ही जगमगा रही होती? ऐसी दूसरी भी बहुत सी कहानियां हैं। कोशिश की इसी तरह की एक कहानी कोविड काल में लाल बहार ने भी की। थोड़े ही वक्त में इसका असर देश के सात राज्य महसूस कर रहे हैं।
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लाल बहार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में डिप्टी एसपी हैं। इनका मूल कैडर दिल्ली पुलिस का है। प्रतिनियुक्ति पर तैनाती आयोग में है। हुआ यह कि कोविड महामारी बीच अगस्त 2020 में वह गाजियाबाद के लोनी स्थित गनौली अपने पैतृक आवास पर पहुंचे। उनकी नजर गांव में खंडहर पड़े पंचायत घर पर पड़ी। मेरठ विश्वविद्यालय के टॉपर रहे लाल बहार के मन में विचार आया कि इसमें बच्चों के लिए पुस्तकालय बनाया जा सकता है। इसको उन्होंने गांव के नौकरीपेशा युवाओं से साझा किया। सभी लाल बहार की सलाह से सहमत दिखे। और फिर क्या था, सबने अपनी-अपनी क्षमता भर का अंशदान किया और देखते ही देखते खंडहर पड़ी इमारत भव्य और आधुनिक पुस्तकालय में बदल गई। पढ़ाई पूरी तरह से नि:शुल्क रखी गई।
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बात यहीं नहीं खत्म हुई। थोड़ा मशहूर होने पर 67 सीट वाले इस पुस्तकालय में पड़ोसी गांवों के बच्चे भी पहुंचने लगे। इससे भीड़ लगने लगी। कई बार जगह पाने के लिए बच्चों को इंतजार करना पड़ता। एक बार फिर पुस्तकालय बनवाने में साथी रहे प्रवीण बैसला, रामवीर तंवर समेत सभी दोस्तों की लाल बहार से चर्चा हुई। योजना बनी कि पड़ोसी गांव के लोगों को पुस्तकालय बनवाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे पहले इन लोगों ने 'ग्राम पाठशाला' नाम का एक फोरम बनाया। जिनकी इस काम में दिलचस्पी थी, उनको इससे जोड़ा और निकल पड़े गांव-गांव में पुस्तकालय के सहारे शिक्षा की अलख जगाने। इसमें इन सबको अपने काम में कामयाबी भी मिली। इसी का नतीजा है कि सात राज्यों में अनौपचारिक तौर पर एक टीम की तरह यह लोग अपने अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।
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तरीका भी बेहद आसान
उत्तर प्रदेश से होता हुआ, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार समेत देश के सात राज्यों तक पहुंच चुका है। करीब तीन सौ से ज्यादा गांवों में आज पुस्तकालय चल रहे हैं। तरीका बेहद सामान्य है। पहले, सोशल मीडिया का इन लोगों ने सहारा लिया। लोगों से अपील की कि वह इस काम में जुड़ें। जहां लोग जुड़ते उनको पहले गनौली गांव की टीम पुस्तकालय खोलने का तरीका सिखाती है। पुस्तकालय खुल जाने के बाद यह इनसे अभियान के विस्तार करने की अपील करती है। आगे इसका जिम्मा यही लोग उठाते हैं। इस तरह से एक चेन बनती जा रही है।

न कोई कोष, न औपचारिक ढांचा
इस अभियान से जुड़े किसी भी शख्स ने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी है। इस अभियान का कोई संयुक्त कोष भी नहीं है। पुस्तकालय खोलने में जो भी खर्च आता है, उसका इंतजाम ग्रामीण स्तर पर ही होता है। वहीं, टीम से जुड़े अपने परिवहन समेत दूसरे खर्चों का वहन खुद ही करते हैं। मजेदार बात यह कि यूपी के बागपत के घिटोरा गांव का पुस्तकालय 40 लाख रुपये में सामुदायिक सहयोग से ही तैयार हुआ है। इस मुहिम में कई जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान भी इस मुहिम से जुड़ गए हैं। 

मंदिर, मस्जिद में भी खुल गए हैं पुस्तकालय 
ग्राम पाठशाला के सदस्य अजय पाल नागर बताते हैं कि अब तक बने तीन सौ से ज्यादा पुस्तकालयों में 290 पुस्तकालय गांव के पंचायत घर में बने हैं। जिन गांवों में लोग पैसा देने में असमर्थ थे, उन गांवों में मंदिर और मस्जिद परिसर में पुस्तकालय खोले गए हैं। अजय पाल ने बताया कि टीम पाठशाला की टीम के सभी सदस्य नौकरीपेशा हैं। इसमें 80 फीसदी लोग पुलिस सेवा से जुड़े हैं। टीम के सदस्य शनिवार और रविवार को किसी भी गांव में जाते हैं और वहां के गांव वालों को इकट्ठा करते हैं। फिर वह गांव के प्रधान से अपने गांव के बच्चों के लिए एक पुस्तकालय खोलने का आग्रह करते हैं, जिसे गांव वाले मना नहीं कर पाते हैं। उनके आने के बाद गांव के लोग मुहिम में जुट जाते हैं और गांव में पैसा इकट्ठा कर पुस्तकालय का निर्माण कर लेते हैं। फिर, गांव वाले पुस्तकालय के उद्घाटन के दिन ग्राम पाठशाला के लोगों को बुलाते हैं। सदस्यों की उपस्थिति में बच्चे या फिर गांव के गणमान्य लोगों से इसका उद्घाटन करवाया जाता है।
 
अजयपाल नागर ने बताया कि पुस्तकालय खोले जाने की बात की जानकारी जब पास के गांव को होती है तो फिर वह अपने गांव में पुस्तकालय खोलने के लिए ग्राम पाठशाला के सदस्यों से संपर्क करते हैं। इस तरह से गांव गांव में पुस्तकालय का निर्माण होने लगा है। इन पुस्तकालय में दान में किताबें दी जाती है और फिर गांव के लोग शादियों के दौरान मंदिर की तरह पुस्तकालय को दान देते हैं, जिससे बच्चों के लिए समाचार पत्र और मैगजीन की व्यवस्था की जाती है।

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