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कारगिल विजय दिवस: दुश्मनों को खदेड़कर कारगिल में फहराया था तिरंगा
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Wed, 26 Jul 2017 09:39 AM IST
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कारगिल वार
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26 जुलाई 1999 को देश के जवानों ने कारगिल में घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए सीमा पार खदेड़कर कारगिल की कई चोटियों पर तिरंगा फहरा दिया था। इस घटना में प्रदेशभर के 73 जवानों ने शहादत दी थी। उन शहीदों की शहादत पर समाज और उनका परिवार नाज करता है।
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फरीदाबाद जिले के मोहना गांव के वीरेंद्र सिंह, पलवल के गढ़ी पट्टी निवासी राजबीर सिंह और पलवल के ही सोफ्ता गांव के मोहम्मद जाकिर हुसैन भी कारगिल विजय की इबारत लिखने के लिए दुश्मनों से लोहा लेते हुए देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
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मोहना गांव के फौजी वीरेंद्र सिंह ने 3 जुलाई 1999 को मस्को घाटी (कश्मीर) में अपनी शहादत देकर कारगिल युद्ध विजय की इबारत लिखी थी। देश प्रेम का ऐसा जज्बा कि शहीद वीरेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार करने के पांचवे दिन ही बड़े भाई फौजी शेर सिंह दुश्मन से मोर्चा लेने लेह-लद्दाख पहुंच गए। वीरेंद्र सिंह की शहादत के 23 दिन बाद ही छद्म युद्ध कर रही पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए थे। देश के लिए जान कुर्बान के फौजी भाईयों के जज्बे को सिर्फ मोहना गांव ही नहीं पूरा देश सम्मान देता है।
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भारत का माथा कहे जाने वाले कश्मीर को देश से अलग करने की नापाक साजिश के तहत मई 1999 में पाकिस्तान ने छद्म वेश में अपनी सेना को नियंत्रण रेखा के पार भेजना शुरू किया था। दरअसल पाकिस्तान कश्मीर पर भारतीय सेना की पकड़ कमजोर करने के लिए कश्मीर और लद्दाख के बीच संपर्क तोडना चाहता था, इसके लिए उसने ऑपरेशन बद्र के नाम से सियाचिन इलाके से भारतीय सेना को हटाने की नापाक साजिश रची थी।
पाकिस्तान की नापाक मंशा को नाकाम करने के लिए करीब दो लाख सैनिकों ने देश की सीमा पर डेरा डाल दिया था। जाट रेजीमेंट में तैनात मोहना गांव का वीरेंद्र ङ्क्षसह भी पाकिस्तानी सेना से मोर्चा ले रहा था। विजय अभी 23 दिन दूर थी कि 3 जुलाई 1999 को मस्को घाटी में दुश्मन की गोली सीने पर खाकर वीरेंद्र देश के लिए शहीद हो गया था।
शहीद कभी मरते नहीं, वीरेंद्र अमर है
वीरेंद्र सिंह के बड़े भाई रिटायर्ड फौजी शेर सिंह फख्र से याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें 6 जुलाई ब1999 को भाई की शहादत की खबर मिली। तब वह जैसलमेर में पोखररण में तैनात थे। शहीद भाई को अंतिम विदाई देने के लिए सेना ने छुट्टी दी थी। 11 जुलाई 1999 को गांव में ही सैनिक सम्मान के साथ शहीद वीरेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार किया था। भाई के अंतिम संस्कार के पांचवे दिन ही वह देश रक्षा के जज्बे से लेह-लद्दाख रवाना हो गए थे। 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान के घुटने टेके तब उन्होंने छोटे भाई के चित्र को सलाम देकर सम्मानित किया था। बताते चलें कि कारश्गिल युद्ध में वीरेंद्र सिंह के साथ देश के 257 वीर सैनिकों ने अपना बलिदान दिया था।
विदाई दिवस पर याद किया जाता है वीरेंद्र
सेना की सिग्नल कोर से रिटायर हुए बड़े भाई फौजी शेर सिंह बताते हैं कि प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। इसमें गांव के छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक जोश से भाग लेते हैं। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में बच्चों से लेकर बुजुर्गों की कबड्डी प्रतियोगिता कराई जाती है।-ऐहतेशाम उद्दीन अहमद