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दिल्ली की सियासी नब्ज के पारखी थे जेटली, बने रहे राजनीति के केंद्र में

Sun, 25 Aug 2019 07:08 AM IST
दुष्यंत शर्मा नवनीत शरण, नई दिल्ली
नवनीत शरण, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 25 Aug 2019 07:08 AM IST
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Jaitley was a connoisseur of the political pulse of Delhi
arun jaitely and kejriwal

एक महीने के भीतर दिल्ली भाजपा का दूसरा मजबूत स्तंभ गिर गया है। सुषमा स्वराज के बाद दिल्ली भाजपा ने अरुण जेटली के रूप में अपना खेवनहार खो दिया। केंद्र के साथ दोनों वरिष्ठ भाजपा नेताओं की दिल्ली की राजनीति में भी अहम भूमिका रहती थी। इनकी सहमति के बिना दिल्ली भाजपा कोई भी फैसला नहीं लेती थी। दिलचस्प यह है कि छात्र नेता रहे जेटली का दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव में भी दखल रहता था। 

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अरुण जेटली दिल्ली भाजपा युवा मोर्चा के पहले अध्यक्ष रह चुके थे। उनके साथ काम करने वाले व युवा मोर्चा मंत्री पद पर जेटली के साथ काम करने वाले धर्मवीर शर्मा ने बताया कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी अरुण जेटली का दिल्ली की राजनीति से काफी लगाव था। 
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डीयू के छात्र राजनीति से लेकर भाजपा में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हुए राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे जेटली दिल्ली की सियासी नब्ज को बखूबी समझते थे। प्रदेश भाजपा में उनकी राय व पसंद मायने रखता था। दिल्ली की राजनीति में दिलचस्पी के कारण कार्यकर्ताओं से भी उनका विशेष लगाव रहता था। 
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समय के साथ उनका राजनीतिक कद जरूर बढ़ा पर दिल्ली की राजनीति के केंद्र में अरुण जेटली बराबर बने रहे। दिल्ली भाजपा की राजनीति भाजपा के तीन कद्दावर केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर रहती थी। अरुण जेटली की सुषमा स्वराज और लालकृष्ण आडवाणी के साथ दिल्ली की सियासत में भी अहम भूमिका रही। तीनों के निर्देश पर भाजपा चुनावी रणनीति तैयार करती थी। 

इतना हीं नहीं दिल्ली में छोटे से बड़े चुनाव का भी चुनावी घोषण पत्र बनाने में भी जेटली विशेष रुचि लेते थे। पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना के मुख्यधारा की राजनीति से हटने के बाद दिल्ली की कमान जेटली व सुषमा स्वराज ही संभालते थे। 
 

चाणक्य की भूमिका में रहते थे 

दिल्ली की राजनीति में अरुण जेटली बराबर चाणक्य की भूमिका में होते थे। एमसीडी का चुनाव हो या दिल्ली विधानसभा का चुनाव, यहां तक कि लोकसभा चुनाव के एजेंडे भी जेटली तय करते थे। दिल्ली में पले-बढ़े जेटली दिल्ली की सियासी नब्ज को पहले ही भांप लेते थे। सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों की हर जानकारी जेटली के पास होती थी। दिल्ली का कौन नेता किस विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ने के काबिल है यह भी वही तय करते थे। एमसीडी चुनाव से लेकर लोक सभा चुनाव तक में प्रत्याशियों के चयन में उनका दखल रहता था। 

चांदनी चौक से भी रहा है नाता
दूसरों को खिलाने व शॉपिंग कराने के शौकीन जेटली का दिल्ली 6 यानी चांदनी चौक से भी नाता रहा है। वह अपने पिता महाराज कृष्ण जेटली के साथ चांदनी चौक स्थित कार्यालय में काम करते थे। वकालत शुरू करने के साथ  पिता के कार्यालय में ही कानूनी दांव-पेच सीखते थे और अदालत में अपने मुवक्किल के पक्ष में दलील पेश करते थे। चांदनी चौक वेलफेयर समिति के प्रवीण शंकर कपूर ने बताया कि चांदनी चौक के परांठा वाली गली के बाद वह अपने पैतृक घर नारायणा में शिफ्ट हो गए।

इसके बाद कैलाश कॉलोनी में स्थायी आशियाना बना लिया। कैलाश कॉलोनी स्थित अपने निवास स्थान से ही दिल्ली की राजनीति को संचालित करते थे। इसके अलावा अशोक रोड स्थित सरकारी आवास पर भी कार्यालय चलाते थे। अक्सर वह अपना साक्षात्कार भी मीडिया को वहीं देते थे। दिल्ली के नेताओं के साथ अक्सर चर्चा करते और उन्हें दिशा दिखाते रहे। अगले कुछ ही महीनों बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव है जिसकी तैयारी में भाजपा नेता जुटे है, इस चुनाव में उनकी कमी नेताओं को महसूस होगी। 

कांग्रेस की हार भांप कर बोले थे ‘द लूजर इज नाव नोन’
दिल्ली की राजनीति की नब्ज जानने वाले जेटली विधानसभा चुनाव 2013 में ही भाप गए थे कि कांग्रेस का क्या हश्र होने वाला है। प्रदेश भाजपा कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि ‘द लूजर इज नाव नोन’। उनका कहा था कि दिल्ली में परिवर्तन की भावना तीव्र और तीखी है। डबल एंटी एनकंबेंसी है। इस स्थिति में कांग्रेस का बने रहना मुश्किल है। 

नेताओं के साथ धरना-प्रदर्शन में शामिल होते थे
केंद्रीय राजनीति के केंद्र में रहने वाले जेटली का दिल्ली की राजनीति से इतना ज्यादा सरोकार था कि वह स्थानीय नेताओं के साथ जंतर-मंतर पर भी विरोध प्रदर्शन में शामिल होते थे।  प्रदेश भाजपा की तरफ से महंगाई, भ्रष्टाचार या किसी अन्य मुद्दे पर सत्ता पक्ष के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन होता था वह खुद वहां पहुंचकर उत्साह बढ़ाते थे।
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