दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के ईगो की लड़ाई में नौकरशाह भी हुए बेलगाम, आम जनता के अटके काम
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दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल के बीच चल रहा विवाद अब अहम का मुद्दा बन गया है। इस अहम की लड़ाई में नौकरशाह जमकर अपनी चला रहे हैं। यही कारण है कि वे विधानसभा को भी कोई अहमियत देने की अपेक्षा अदालत में जाकर विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को ही चुनौती दे रहे हैं।
संभवत: दिल्ली के इतिहास में यह पहला मौका है कि अधिकारी बेखौफ हुए हों। इन सबके बीच पिस रही जनता के जनहित के काम प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली सरकार की लड़ाई केंद्र व उपराज्यपाल के बीच जगजाहिर है।
दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर भाजपा के मुख्यमंत्री रहे मदन लाल खुराना या फिर कांग्रेस सरकार में सीएम रही शीला दीक्षित का भी केंद्र से टकराव रहा है।
हालांकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, बावजूद टकराव के चलते वे बीच का रास्ता निकाल कर काम करते रहे हैं। शीला कई बार नौकरशाहों से भी समझौता कर चुकी हैं।
आप सरकार के आने पर टकराव बढ़ा
आप सरकार के आने पर टकराव बढ़ा है। दरअसल, आप नेता आंदोलन से निकले हैं और वे बीच का रास्ता निकालने की अपेक्षा हर काम को जल्दबाजी में करने में उपराज्यपाल या फिर केंद्र सरकार से भिड़ते रहे हैं।
यही कारण है कि बीच का रास्ता छोड़ने के चलते टकराव इतना बढ़ गया कि केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर उनके कई अन्य अधिकार भी छीन लिए। हुआ यह कि हाईकोर्ट ने भी केंद्र सरकार के निर्णय पर मुहर लगाकर उपराज्यपाल को दिल्ली का बॉस बना दिया।
उधर, मुख्यसचिव से कथित मारपीट मामले ने आग में घी का काम किया और सभी नौकरशाहों ने दिल्ली सरकार से असहयोग का रास्ता अख्तियार कर लिया। मारपीट हुई या नहीं, यह तो अब अदालत में ही तय होगा।
कौन झूठ बोल रहा है कौन सच, यह तो मुख्यसचिव व आप नेता ही जानते हैं लेकिन जिस प्रकार से नौकरशाहों ने रास्ता अपनाया है, उससे स्पष्ट जरूर है कि उनको शह जरूर है।
वरना कई राज्यों में सड़क पर नौकरशाहों से मारपीट हुई लेकिन उन्होंने चुपचाप काम करना ही उचित समझा। कारण भी स्पष्ट है कि उनको लगा कि राज्य सरकार के पास पूरे अधिकार होने से कहीं उनके भविष्य पर आंच न आ जाए।
अब दिल्ली में कोई झुकने को तैयार नहीं। यानी न सरकार माफी मांगने को तैयार न नौकरशाह काम करने को। ऐसे में दोनों ने अहम का मुद्दा बना रखा है। किसी भी राज्य में विधानसभा सर्वोच्च है।
विधायकों के सवालों का जवाब देना अधिकारियों का कर्तव्य व जिम्मेदारी है लेकिन जिस प्रकार अधिकारियों ने विधानसभा में आने से ही मना कर दिया और न ही जवाब दिए उससे स्पष्ट है कि वे विधानसभा तक को कुछ नहीं समझ रहे। इस लड़ाई में आम जनता के कार्य प्रभावित हो रहे हैं और कई काम ऐसे हैं जो महीनों से रुके पड़े हैं।