करोड़ों का है सालाना कारोबार, बचा कर रखें वाहन
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शहर में लग्जरी वाहनों की बढ़ती संख्या के बीच वाहन चोरी के आंकड़ों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। हर साल दो हजार से ज्यादा वाहन चोरी हो रहे हैं जिसमें से महज 25 फीसदी वाहन ही वापस मिल पाए हैं जबकि आधे मामलों में फाइनल रिपोर्ट लगाकर फाइल बंद कर दी जाती है।
चौंकाने वाली बात यह है कि चोरी का यह कारोबार सालाना करोड़ों रुपये का है। यह रुपये कहां जाते हैं किस काम में प्रयोग होते हैं। इसकी जानकारी पुलिस व आला अधिकारियों के पास नहीं है।
इतनी बड़ी संख्या में वाहन चोरी होना पुलिस विभाग की मुस्तैदी पर भी सवालिया निशान लगाने के लिए काफी है। वहीं, यहां से चोरी हुए अधिकांश वाहन हाईटेक तकनीक से लैस होते हैं।
पश्चिमी यूपी में वाहन चोरी का एक बड़ा गिरोह
उदाहरण के तौर पर गणतंत्र दिवस से पहले आईटीबीपी के आईजी की नीली बत्ती लगी कार, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जर्नल की कार और अन्य वीवीआईपी लोगों की कार का चोरी हो जाना है जबकि इनमें सेंसर से लेकर जीपीएस सिस्टम भी लगा था।
वाहन चोरी पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस के पास कोई योजना भी नहीं है। आंकड़े बता रहे हैं कि औसत हर रोज शहर से दर्जन भर वाहन चोरी हो रहे हैं।
पश्चिमी यूपी में वाहन चोरी का एक बड़ा गिरोह सक्रिय है। एनसीआर से चोरी हुए अधिकांश वाहन बुलंदशहर, खुर्जा, मेरठ, मुज्जफरनगर में ले जाकर पिघला या काट दिए जाते हैं।
आधा दर्जन से अधिक गैंग का खुलासा
एक साल के दौरान आधा दर्जन से अधिक गैंग का खुलासा नोएडा पुलिस ने किया है। वहीं, चोरों की नजर महंगे वाहनों के स्पेयर पार्ट पर भी रहती है। कई मामलों में चोरी करने में नाकाम बदमाश ऐसे वाहनों से ईसीएम, साइड मिरर, पहिये व म्यूजिक सिस्टम आदि पर हाथ साफ कर देते हैं। जिनकी कीमत बाजारों में कई हजारों रुपये की होती है।
वाहन चोरी न हो इसके लिए पुलिस व यातायात विभाग द्वारा शहर में जागरूक कार्यक्रम किए गए, लेकिन कुछ एक को छोड़ दे तो अधिकांश नोएडावासी इनमें आने से कतरा रहे हैं। वहीं, शोरूम से निकलने वाले वाहन लाखों व करोड़ों की कीमत के होते हैं।
इनमें सुरक्षा के वही उपकरण लगे होते हैं जो कंपनी द्वारा लगाकर दिए जाते हैं। इसके इतर सुरक्षा के जो भी उपकरण (आठ से दस हजार रुपये) के हैं उसे बाहर से खरीदकर लगाना पड़ता है। ऐसे में ग्राहक कंपनी के उपकरणों पर ही भरोसा कर घटना का शिकार बनते हैं।