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हाईकोर्ट ने कहा : विवाह, दुष्कर्म में कानून से बचने के लिए धर्म परिवर्तन चिंता का विषय, मामलों का बढ़ना गंभीर
Sat, 20 Jan 2024 05:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 20 Jan 2024 05:18 AM IST
सार
साथ ही, दुष्कर्म के एक आरोपी के खिलाफ एफआईआर इस आधार पर रद्द करने से इन्कार कर दिया कि उसने पीड़िता के साथ शादी कर ली है।
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Delhi high court
- फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने सिर्फ शादी के मकसद या दुष्कर्म के मामलों में कानून से बचने के लिए किए गए धर्म परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की है। साथ ही, दुष्कर्म के एक आरोपी के खिलाफ एफआईआर इस आधार पर रद्द करने से इन्कार कर दिया कि उसने पीड़िता के साथ शादी कर ली है।
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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने दुष्कर्म व आपराधिक धमकी के अपराध में आरोपी की याचिका पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा, इस मामले में पुरुष और महिला एक-दूसरे से शादी नहीं कर सकते। मुस्लिम होने के नाते पुरुष अपने पर्सनल कानून के तहत चार शादियां कर सकता है, पर वह इस महिला से शादी नहीं कर सकता, जो हिंदू है और उसका पति जिंदा है। उसने तलाक भी नहीं लिया है।
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अदालत ने कहा, यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि पीड़िता व आरोपी के बीच शादी भारतीय दंड संहिता की धारा 376 यानी दुष्कर्म के तहत दर्ज हर मामले की एफआईआर को रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार है। शादी का समय भी मायने रखता है। 2022 में इस मामले में केस दर्ज होने के 10 दिन बाद पीड़िता ने धर्म परिवर्तन किया और उसी दिन आरोपी के साथ उसकी शादी भी हो गई।
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अदालत ने कहा, हमारी चिंता गंभीर है क्योंकि अदालतों को लगातार ऐसे मामलों का सामना करना पड़ रहा है, जहां धर्म परिवर्तन सिर्फ शादी के उद्देश्य और कानून से बचने के लिए किया जा रहा है। इससे भी अधिक चिंता की बात है कि कई मामलों में दर्ज एफआईआर को आरोपी व पीड़िता के बीच धर्म बदलने और शादी के आधार पर रद्द करने की मांग की जाती है। एफआईआर रद्द करने के बाद पीड़िता को छोड़ दिया जाता है या तलाक दे दिया जाता है।
जस्टिस शर्मा ने कहा, निस्संदेह किसी महिला के खिलाफ यौन हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा, धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह भावी जीवनसाथी की पहचान सावधानीपूर्वक सत्यापित करे। धर्म परिवर्तन और उसके बाद विवाह की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता होनी चाहिए।
दिशा-निर्देश भी जारी किए
अदालत ने धर्मांतरण के बाद अंतरधार्मिक विवाह और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत यौन पीड़िताअों के बयान दर्ज करने के लिए अधिकारियों द्वारा पालन किए जाने वाले दिशानिर्देश जारी किए हैं।
- निर्देशों में कहा कि धर्मांतरण प्रमाणपत्र के साथ एक प्रमाणपत्र संलग्न किया जाना चाहिए जिसमें कहा गया हो कि धर्मांतरण करने वाले को अपनाए जाने वाले धर्म के सिद्धांतों और अधिकार से संबंधित निहितार्थों के बारे में बताया गया है। धर्मांतरण और विवाह का प्रमाणपत्र अतिरिक्त स्थानीय भाषा में भी होना चाहिए।