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चालीस साल बाद अरावली के जंगलों में दिखा ऐसा फल
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
Updated Sat, 28 Nov 2015 05:39 PM IST
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अरावली श्रृंखलाओं में करीब चालीस साल बाद झाड़ियों में ऐसा फल देखने को मिला है कि झाड़ बेरों के बोझ से जमीन में टिक रहे हैं। अलसुबह पहाड़ियों में आसपास की महिलाऐं और बच्चे बेर तोड़ने के लिए पहुंच जाते हैं।
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ऐसा जोश पहली बार देखने को मिल रहा है क्यों न हो सन् 1974 में बाढ़ (भरिया के दौरान) जल स्तर बढ़ने से पहाड़ों पर ऐसा हुआ।
नगीना खंड़ के गांव शाहपुर, नोटकी, फखरपुरखोरी, घागस, कन्साली, कोटला, मेवली, गहबर, सांठावाड़ी, नांगलमुबारिकपुर, नावली इत्यादि गांवों में लोग इसे कुदरत का करिश्मा मानकर चल रहे हैं।
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कन्साली के बुजुर्ग हाजरखां, घागस के हाजी हनीफ, आस मोहमद, हुसैन खां, सुल्तान, जुमेखां सांठावाडी ने बताया कि चार दशक पहले काला पहाड़ श्रृंलाओं में झाड़ियों पर बेर ऐसे दिखाई देते थे जैसे किसी मधुमक्खी के छत्ते में मक्खियां लिपटी हों।
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इस बार घागस कन्साली, शाहपुर, नोटकी की पहाड़ियां बेरों से लदी हैं। मेवात के बाजारों में भी इस बेर की भारी मांग है। आजकल संबंधित गांवों में एक किलोग्राम बेर की कीमत 60 से 80रू है।
आसपास के बाजार वाले यहां से बेर खरीदकर बाजार में 100 से 120 के बीच बेच रहे हैं। वहीं कुछ पहाड़ियां ऐसी भी हैं जिन पर बेर वाली झाड़ लुप्त होती जा रही है। इन पहाड़ियों में झिमरावट, खानपुरघाटी, ढाढोलीकलां, बारा, बाजीदपुर, रीठट आदि गांव शामिल हैं।
पहाड़ियों में भेड़-बकरी, गाय चरवाह ईशब खां, अतर सिंह, हाकम ने बताया कि सच तो यही है कि लबे समय बाद झाड़ियों में फलत ज्यादा आया है। दीवाली से ये बेर झाड़ियों में पक चुके हैं जो दिसबर महीने तक चलते हैं।
अरावली संरक्षण अधिकारी अब्दुल गफार बताते हैं कि कई साल से मेरी ड्यूटी इन्हीं पहाड़ियों पर है मैंने भी इतने बेर एक साथ झाड़ियों में पहले कभी मेवात के पहाड़ों पर नहीं देखे। रोजाना कई दर्जन गांवों की महिलाऐं दस से पन्द्रह किलोमीटर दूर से चलकर बेर तोड़ने के लिए पहुंच रही हैं।
हकीम नसरूद्दीन औलिया ने बताया कि झाड़ के बेरों में विटामिन ए, बी, सी, डी, ई प्रचुर मात्रा में मिलता है। जो औरतों और बच्चों में खून की कमी पूरा करने में सहायक है। बेर से बना चूर्ण पेट की बीमारियों में लाभदायक है।