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विधानसभा चुनाव: महंगे हुए भाड़े के कार्यकर्ता

Tue, 26 Aug 2014 05:56 AM IST
Updated Tue, 26 Aug 2014 05:56 AM IST
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Haryana Assembly Elections: Hire workers to expensive.

फरीदाबाद में अधिकांश टिकटार्थी नेता जमीनी नहीं हैं। चाहे वह कांग्रेस में हों, भाजपा में हों या फिर इनेलो, बसपा और हजकां में। इसलिए वह जलसा, जुलूस और शक्ति प्रदर्शन के लिए मजदूरों और स्लम में रहने वाले उन लोगों को खोज रहे हैं जो दिहाड़ी पर काम करते हैं।

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हवा-हवाई नेताओं के लिए अब ये भाड़े के कार्यकर्ता बहुत महंगे पड़ रहे हैं। क्योंकि मनरेगा की मजदूरी 236 रुपये प्रतिदिन हो गई है, जबकि निर्माण कार्य में लगे श्रमिक 300 रुपये प्रतिदिन तक पा रहे हैं। ऐसे में अब भीड़ बढ़ाने वाले ये कार्यकर्ता नेताओं से 350 रुपये और खाना-पीना मांग रहे हैं। हालांकि, जो बेरोजगार बैठे हैं वह 200 रुपये में भी जाने को तैयार हैं।
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जिले में कुछ नेता तो ऐसे हैं जो मजदूरों को ही माला पहनाकर बता देते हैं कि ये लोग कौन सी पार्टी छोड़कर आए हैं। जबकि वे किसी पार्टी के सदस्य नहीं होते। अपने पक्ष में माहौल बनाने का ऐसा तरीका भी अपनाया जा रहा है। ऐसे नेता झुग्गियों और स्लम कॉलोनियों के प्रधानों से संपर्क कर सौ-दो सौ लोगों को अपनी सभाओं में ले आने-ले जाने का ठेका दे रहे हैं।

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अब तो पोस्टर चिपकाने वाला भी कार्यकर्ता नहीं मजदूर होता है

Haryana Assembly Elections: Hire workers to expensive.

नेताजी चाहे किसी भी दल के हों उनकी जय-जयकार लगाने और गली-गली घूमकर माहौल बनाने के लिए बुकिंग शुरू हो गई है। सेक्टर-17 के लेबर चौक पर खड़े निहाल, जगबीर, मुसाफिर एवं दया नामक दिहाड़ी मजदूरों ने बताया कि पिछले लगभग एक माह से नेता लोग भी उनके पास आने लगे हैं। इसी प्रकार से एसी नगर, राहुल कॉलोनी, बापू नगर एवं पल्ला क्षेत्र की कॉलोनियों में भी डमी कार्यकर्ता तैयार हैं।

शहर के जाने-माने श्रमिक नेता बेचू गिरी कहते हैं कि अब ज्यादातर पार्टियों में जमीनी नेता नहीं हैं। वह चार साल चुप रहते हैं। चुनावी साल में पैसे के बल पर पद और टिकट लेकर सक्रिय हो जाते हैं इसलिए उन्हें कार्यकर्ता खरीदने पड़ते हैं। पहले प्रत्याशी और दावेदारों के साथ पार्टी वर्कर बिना पैसे की आशा किए लगते थे। लेकिन अब नेता बदल गए हैं इसलिए जनता भी बदल गई है। वह पैसा और खाना लेकर रैलियों में आते हैं। चुनाव में बैनर, होर्डिंग, पोस्टर लगाने वाले भी अब कार्यकर्ता नहीं मजदूर होते हैं।

राजनीति विज्ञान के जानकार एवं लेखक राजेंद्र चोपड़ा कहते हैं कि अब भाड़े के कार्यकर्ता इसलिए आते हैं क्योंकि करिश्माई नेता नहीं रहे। आज जहां नेहरू ग्राउंड है वहां 1950 के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू आए थे। उस समय उन्हें देखने के लिए अपरंपार भीड़ थी। लोग दूर-दूर से उन्हें सुनने आए थे। अब बहुत सारे नेता जनता का काम करवाने के लिए भी पैसे लेते हैं। पैसे और बाहुबल से राजनीति में आते हैं इसलिए उनके कार्यकर्ता नहीं होते बल्कि प्रलोभन देकर खरीदने पड़ते हैं।

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