1999 के कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे नसरुद्दीन, परिजनों को ढूंढनी पड़ती है कब्र
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26 जुलाई को पूरा देश शहादत दिवस के रूप में मना रहा है। वहीं साल 1999 में कारगिल में शहीद हुए हींगनपुर के शहीद नसरुद्दीन को श्रद्धांजलि देने के बहाने कोई आजतक दो फूल भी नहीं चढाने पहुंचा।
इतना ही नहीं उस समय राज्य और केंद्र सरकार ने जो भी वादे किये, उसे भी पूरा नहीं किया। जिसकी वजह से शहीद की पत्नी आसिया और पुत्र इरशाद के अलावा गांव के लोगों में इस अनदेखी से नाराजगी है।
करीब 18 साल पहले हरियाणा और केंद्र सरकार ने भी नसुरुद्दीन का शहीद स्मारक बनाने की घोषणा की थी। लेकिन आज तक कोई स्मारक नहीं बना। उनकी कब्र को कांटेदार झाड़ियों और बरसात के समय होने वाले खरपतवारों ने छुपा दिया है।
उनके शहीदी दिवस पर उनके परिवार को भी बड़ी मुश्किल से कब्र को ढूंढ़ना पड़ता है। उस समय के पूर्व पशुपालन मंत्री मोहम्मद इलयास ने शाहचौखा से गांव हींगनपुर तक मार्ग और गांव औथा के हाई स्कूल को शहीद नसरुद्दीन के नाम से रखने का ऐलान किया था।
मंत्री के आदेश पर डीसी ने तुरंत हींगनपुर मार्ग और औथा हाईस्कूल पर शहीद नसरुद्दीन के नाम का बोर्ड लगा भी दिया था, लेकिन आज तक स्कूल और मार्ग को सरकार की तरफ से मंजूरी नहीं मिली। जिसकी वजह से वहां से नसरुद्दीन का नाम हटा दिया गया है।
शहीद की पत्नी आशिया कहती हैं कि उनका पति देश के लिये शहीद हुआ लेकिन सरकार उनकी कब्र पर कोई समाधी या स्मारक तक नहीं बना सकी।
लड़के के बड़े होने सरकार ने सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया था। इन वादों को पूरा करना तो दूर आज तक कोई राजनेता और प्रसाशन का अधिकारी उनका हालचाल पूछने तक नहीं आया है।
वहीं बेटा इरशाद का कहना है कि सभी शहीदों की याद में स्मारक बने हैं, उनको हर साल श्रद्धांजलि देने के लिये कोई न कोई सरकार का नुमाइंदा जाता है, लेकिन उनके पिता को श्रद्धांजलि देने के लिये आजतक कोई नहीं आया।
गांव के रहने वाले महबूब कहते हैं कि सरकार ने शाहचौखा से हींगनपुर तक सड़क और गांव औथा हाई स्कूल को नाम नसरुद्दीन के नाम से रखने की घोषणा की थी लेकिन कागजों में आजतक नहीं चढ़ा।