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Ghaziabad News: घर की दहलीज से अदालत पहुंचीं महिलाएं, समझौते की राह में दूरी

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Mon, 14 Sep 2026 02:18 AM IST
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Women move from the domestic threshold to the courtroom; a settlement remains distant.
जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में आयोजित लोक अदालत में चालान के निस्तारण के लिए कतार में खड़े लोग
गाजियाबाद। वैवाहिक विवाद जब अदालत तक पहुंचता है तो रिश्ते को दोबारा जोड़ने की राह आसान नहीं रहती। शनिवार को आयोजित लोक अदालत में परिवार न्यायालय से समझौते के आधार पर वापस हुए 64 मामलों में सभी पुरुष पक्षकार थे। किसी महिला ने अपना वाद वापस नहीं लिया। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच चुके वैवाहिक विवादों में समझौते और साथ लौटने के फैसले के पीछे कई जटिल सामाजिक और भावनात्मक परिस्थितियां होती हैं।
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परिवार न्यायालय में लंबे समय से पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े मामले पहुंच रहे हैं। इनमें दहेज, घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, आपसी मतभेद और लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद प्रमुख हैं। शनिवार की लोक अदालत में समझौते के बाद 64 पुरुषों ने अपने मामले वापस लिए। इन मामलों में पुरुष पक्ष की ओर से घर बसाने की पहल हुई, जबकि महिला पक्ष की ओर से कोई वाद वापस नहीं लिया गया।
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रिश्ते में सुरक्षा, सम्मान और भरोसा जरूरी
महिला अधिवक्ता सिंधुप्रभा झा का कहना है कि महिलाओं के अदालत तक पहुंचने के पीछे केवल वैवाहिक विवाद नहीं, बल्कि लंबे समय से झेली गई मानसिक और सामाजिक परेशानियां भी होती हैं। कोई महिला जब कानूनी प्रक्रिया शुरू करती है तो कई बार वह परिवार और समाज के दबाव से निकलकर निर्णय ले चुकी होती है। ऐसे में केवल समझौते के आधार पर वापस लौटना उसके लिए आसान नहीं होता। यदि महिला को रिश्ते में सुरक्षा, सम्मान और भरोसा दिखाई दे तो समझौते की संभावना बढ़ सकती है।
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दबाव में हुआ समझौता लंबे समय तक प्रभावी नहीं
पूर्व प्रधान न्यायाधीश परिवार न्यायालय एससी त्रिपाठी का कहना है कि लोक अदालत का उद्देश्य विवादों का शांतिपूर्ण समाधान कराना है। परिवार से जुड़े मामलों में समझौता तभी टिकाऊ होता है, जब दोनों पक्ष अपनी इच्छा से सहमत हों। किसी एक पक्ष पर दबाव बनाकर कराया गया समझौता लंबे समय तक प्रभावी नहीं रहता। पति-पत्नी के बीच संवाद और विश्वास बहाल करना ऐसे मामलों के समाधान की पहली शर्त है।

भावनात्मक स्थिति समझना भी जरूरी
एमएमजी अस्पताल की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. चंदा यादव का कहना है कि अदालत पहुंचने से पहले महिलाएं अक्सर लंबे समय तक मानसिक तनाव झेलती हैं। लगातार विवाद, अपमान और असुरक्षा का अनुभव व्यक्ति के भीतर रिश्ते को लेकर भरोसा कमजोर कर देता है, इसलिए समझौते के लिए केवल कानूनी स्तर पर सहमति पर्याप्त नहीं है। दोनों पक्षों की भावनात्मक स्थिति समझने और संवाद बहाल करने की जरूरत होती है।


भविष्य की स्थिरता भी अहम
परिवार न्यायालय में मामलों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता डॉ. राजकुमार चौहान का कहना है कि लोक अदालत में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि वैवाहिक विवादों में समझौते की पहल केवल मामले खत्म करने तक सीमित नहीं है। रिश्ते में वापस लौटने से पहले महिलाएं सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की स्थिरता को भी अहम मान रही हैं।
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