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उम्रकैद की सजा हो चुकी थी जितेंद्र को, जमानत पर थे

Sun, 03 Jul 2016 12:36 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो /गाजियाबाद
अमर उजाला ब्यूरो /गाजियाबाद Updated Sun, 03 Jul 2016 12:36 AM IST
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Jitender was sentenced to life, were on bail
अपराध्‍ा - फोटो : अमर उजाला

बिल्डर जितेंद्र तोमर को हत्या के एक मामले में सेशन कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा हो चुकी थी। इन दिनों वह जमानत पर थे, केस की हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही थी। उनकी पत्नी और बेटे को डर था कि हाईकोर्ट ने अगर जितेंद्र की सजा बरकरार रखी तो वह करोड़ों रुपये की जमीन को बेच न दें या फिर बेटी के नाम न कर दें। डर की वजह यह थी कि पत्नी मालती और बेटे अमित से उनकी बनती नहीं थी। अक्सर झगड़ा रहता था। वह उनसे अलग आरडीसी में रहते थे।

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26 जून को पत्नी और बेटे का जितेंद्र से जमीन को लेकर ही झगड़ा हुआ था, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। कविनगर एसएचओ अशोक सिसौदिया ने बताया कि शामली में हुए एक हत्याकांड में जितेंद्र को आजीवन कारावास की सजा होने की वजह से ही जमीन को लेकर उसकी पत्नी और बेटे बौखलाए हुए थे। उन्होंने बताया कि बिल्डर जितेंद्र तोमर हत्याकांड में फरार उसकी पत्नी की तलाश में कविनगर पुलिस मेरठ, मुजफ्फरनगर और हरिद्वार में दबिश दे रही है। जल्द ही उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा। 
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बता दें कि जितेंद्र तोमर आरडीसी में रहते थे। 26 जून को उनकी हत्या कर दी गई थी। एक जुलाई को पुलिस ने उनके बेटे और ड्राइवर को गिरफ्तार कर हत्याकांड का खुलासा किया था। उनकी हत्यारोपी पत्नी फरार है।
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 जितेंद्र तोमर के फेसबुक अकाउंट को खंगालने पर पता चलता है कि उनके पारिवारिक रिश्ते तल्ख थे और वह फेसबुक पर लगातार अपना दर्द बयां करते रहते थे। छह जून को उन्होंने अपना 61वां बर्थडे मनाया था।

23 जून को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट डाली है, ‘बासुंरी से सीख ले एक नया सबक ए जिंदगी, लाख सीने में जख्म हों फिर भी गुनगुनाती है।’ 22 जून को लिखा ‘रिश्तों की सिलाई अगर भावनाओं से हुई है तो टूटना मश्किल है, अगर स्वार्थ से हुई है तो टिकना मुश्किल है।’ 21 जून लिखा ‘अपना कभी छोड़कर नहीं जाता और जो जाए वो अपना नहीं होता।’ 19 जून को लिखा ‘अच्छे और सच्चे रिश्ते न तो खरीदे जा सकते हैं, न उधार लिए जाते हैं।’

30 मई को लिखा, ‘कुछ लोग खाने के इतने शौकीन होते हैं कि वो दूसरों की खुशियां भी खा जाते हैं।’ 20 मई लिखा ‘शतरंज में वजीर और जिंदगी में जमीर अगर मर जाए तो खेल खत्म समझिए।’


14 मई को लिखा ‘इंसान सबकुछ भूल सकता है सिवाय उन लम्हों के जब उसे अपनों की जरूर थी और वह साथ नहीं थे।’ 27 फरवरी  को लिखा ‘जिंदगी के सफर में बस इतना सबक सीखा, सहारा कोई कोई ही देता है, लेकिन धक्का देने के लिए हर शख्स तैयार बैठा है।’

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