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Ghaziabad News: ई-वे बिल, आरएफआईडी टैग खोल रहे जीएसटी चोरी की पोल
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गाजियाबाद। जीएसटी चोरी के लिए अपनाए जा रहे नए-नए हथकंड़ों को पकड़ने के लिए राज्यकर विभाग के अधिकारियों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस टूल्स और अन्य आधुनिक तकनीक बड़ा हथियार बन गया है। ई-वे बिल और वाहनों पर लगाए गए आरएफआईडी टैग भी टैक्स चोरी की पोल खोल रहे हैं। राज्यकर विभाग के अधिकारी इसी आधुनिक तकनीक के जरिए अब तक करीब 500 करोड़ से ज्यादा की जीएसटी चोरी पकड़ चुके हैं।
दरअसल, वित्त मंत्रालय ने जीएसटी चोरी पकड़ने के लिए अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर डिजाइन किए हैं। यूपी राज्यकर विभाग के अधिकारियों ने भी सॉफ्टवेयर में एआई टूल्स का इस्तेमाल किया है। व्यापारियों की ओर से हर माह दाखिल की जाने वाली जीएसटी रिटर्न और फिर तीन महीने के अंतराल पर भरी जाने वाली रिटर्न के आंकड़ों में मामूली अंतर भी इन एआई टूल्स की नजरों से नहीं बच पाता है। राज्यकर विभाग के अधिकारियों ने बताया कि एआई टूल्स व्यापारियों और फर्म की हर गतिविधि पर नजर रखता है। टैक्स कंप्लाइंस की निगरानी के साथ-साथ रिटर्न दाखिल न करने वालों की पहचान भी इससे हो जाती है। इस टूल्स के माध्यम से ऐसी फर्माें को साफ्टवेयर खुद ब खुद चिह्नित कर अलग दर्शा देता है। यही नहीं अयोग्य यानी बिना अधिकार के इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने वाली फर्माें को भी यह टूल्स चिह्नित कर लेते हैं और अधिकारियों को इनकी जानकारी मिल जाती है। व्यापारियों की ओर से दाखिल की गई जीएसटी रिटर्न के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह व्यापारी की घोषित टर्न ओवर और ई-वे बिलों के आधार पर टैक्स के अंतर को प्रदर्शित कर देते हैं। यह तकनीक अब टैक्स चोरी करने वाली फर्माें को उजागर कर देती है।
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आरएफआईडी स्कैनर जांच से पकड़ी चोरी
राज्यकर विभाग के अपर आयुक्त ग्रेड-2 ओपी तिवारी ने बताया कि कई मामलों में व्यापारियों ने ई-वे बिल जनरेट कर गाड़ी नंबर भी उस पर दर्शाया और बताया गया कि माल की खरीद और बिक्री अन्य फर्माें से की गई है। इसकी जांच के दौरान ट्रक नंबरों को लेकर देश भर में जगह-जगह हाईवे पर लगे आरएफआईडी स्कैनर का डाटा चेक किया गया तो पता चला कि इस नंबर के वाहन की लोकेशन किसी दूसरे राज्य में मिली। यानी इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने के लिए व्यापारियों की ओर से फर्जी बिल काटे गए।
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बयान
जीएसटी चोरी पकड़ने में एआई टूल्स और तकनीक का महत्व बढ़ गया है। अब मैनुअल सूचनाओं की बजाय एआई टूल्स से बड़ी-बड़ी चोरी पकड़ी जा रही हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष में करीब 300 करोड़ से ज्यादा टैक्स चोरी एआई टूल्स और तकनीक के इस्तेमाल से पकड़ी जा चुकी हैं। - दिनेश कुमार मिश्रा, अपर आयुक्त ग्रेड-1
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दरअसल, वित्त मंत्रालय ने जीएसटी चोरी पकड़ने के लिए अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर डिजाइन किए हैं। यूपी राज्यकर विभाग के अधिकारियों ने भी सॉफ्टवेयर में एआई टूल्स का इस्तेमाल किया है। व्यापारियों की ओर से हर माह दाखिल की जाने वाली जीएसटी रिटर्न और फिर तीन महीने के अंतराल पर भरी जाने वाली रिटर्न के आंकड़ों में मामूली अंतर भी इन एआई टूल्स की नजरों से नहीं बच पाता है। राज्यकर विभाग के अधिकारियों ने बताया कि एआई टूल्स व्यापारियों और फर्म की हर गतिविधि पर नजर रखता है। टैक्स कंप्लाइंस की निगरानी के साथ-साथ रिटर्न दाखिल न करने वालों की पहचान भी इससे हो जाती है। इस टूल्स के माध्यम से ऐसी फर्माें को साफ्टवेयर खुद ब खुद चिह्नित कर अलग दर्शा देता है। यही नहीं अयोग्य यानी बिना अधिकार के इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने वाली फर्माें को भी यह टूल्स चिह्नित कर लेते हैं और अधिकारियों को इनकी जानकारी मिल जाती है। व्यापारियों की ओर से दाखिल की गई जीएसटी रिटर्न के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह व्यापारी की घोषित टर्न ओवर और ई-वे बिलों के आधार पर टैक्स के अंतर को प्रदर्शित कर देते हैं। यह तकनीक अब टैक्स चोरी करने वाली फर्माें को उजागर कर देती है।
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आरएफआईडी स्कैनर जांच से पकड़ी चोरी
राज्यकर विभाग के अपर आयुक्त ग्रेड-2 ओपी तिवारी ने बताया कि कई मामलों में व्यापारियों ने ई-वे बिल जनरेट कर गाड़ी नंबर भी उस पर दर्शाया और बताया गया कि माल की खरीद और बिक्री अन्य फर्माें से की गई है। इसकी जांच के दौरान ट्रक नंबरों को लेकर देश भर में जगह-जगह हाईवे पर लगे आरएफआईडी स्कैनर का डाटा चेक किया गया तो पता चला कि इस नंबर के वाहन की लोकेशन किसी दूसरे राज्य में मिली। यानी इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने के लिए व्यापारियों की ओर से फर्जी बिल काटे गए।
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बयान
जीएसटी चोरी पकड़ने में एआई टूल्स और तकनीक का महत्व बढ़ गया है। अब मैनुअल सूचनाओं की बजाय एआई टूल्स से बड़ी-बड़ी चोरी पकड़ी जा रही हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष में करीब 300 करोड़ से ज्यादा टैक्स चोरी एआई टूल्स और तकनीक के इस्तेमाल से पकड़ी जा चुकी हैं। - दिनेश कुमार मिश्रा, अपर आयुक्त ग्रेड-1