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फर्जी था भोजपुर एनकाउंटर, चार पुलिसकर्मी दोषी करार
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Tue, 21 Feb 2017 12:27 AM IST
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सीबीआई कोर्ट से बाहर आता आरोपी
- फोटो : अमर उजाला
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सीबीआई कोर्ट ने 20 साल पहले भोजपुर में हुए चार युवकों के एनकाउंटर को फर्जी माना है। सोमवार को विशेष सीबीआई न्यायाधीश राजेश चौधरी की कोर्ट ने मामले में चार पुलिसकर्मियों को हत्या और फर्जी सुबूत पेश करने के आरोप में दोषी करार दिया। सजा पर बहस 22 फरवरी को होगी।
8 नवंबर 1996 को भोजपुर पुलिस ने चार युवकों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था। मारे गए युवक मोदीनगर की विजयनगर कालोनी के जलालुद्दीन, प्रवेश, जसवीर और अशोक थे, जो फैक्ट्री में नौकरी और मजदूरी करते थे।
मृतकों के परिजनों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताते हुए विरोध प्रदर्शन किया था और सीबीआई जांच की मांग की थी। सात अप्रैल 1997 को सीबीआई को इसकी जांच सौंपी गई थी। 10 सितंबर 2001 को सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट पेश की थी, जिसमें तत्कालीन भोजपुर एसओ लाल सिंह, एसआई जोगेंद्र, कांस्टेबल सुभाष, सूर्यभान और रणवीर को आईपीसी की धारा 302, 149, 193 और 201 के तहत आरोपी बनाया था।
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केस की सुनवाई के दौरान 27 अप्रैल 2004 को रणवीर की मृत्यु हो गई थी। बाकी चारों पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। जमानत पर चल रहे लाल सिंह, जोगेंद्र और सुभाष कोर्ट में उपस्थित थे, जिन्हें हिरासत में लेकर डासना जेल भेज दिया गया, जबकि सूर्यभान इलाहाबाद गया हुआ था, वह उपस्थित नहीं हो सका। उसके अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वह गाजियाबाद के लिए रवाना हो गया है। ट्रेन का एक्सीडेंट होने की वजह से उसे देर हो गई है।
प्रमोशन पाने के लिए किया था फर्जी एनकाउंटर
विशेष सीबीआई कोर्ट ने 226 पेज के फैसले में सीबीआई की थ्योरी को सही माना कि भोजपुर फर्जी एनकाउंटर में मारे गए चारों युवक निहत्थे थे। पुलिस उन्हें चाय की दुकान से जीप में उठाकर ले गई थी।
आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने के लिए पुलिसकर्मियों ने दो युवकों को पुलिया पर और दो को ईंख के खेत में मार गिराया था। मुठभेड़ साबित करने के लिए उनके पास तमंचे रख दिए थे और उनसे 16 राउंड फायर किए जाने का दावा किया था। इस मामले में 112 लोगों की गवाही हुई।
दोषी करार दिया गया तत्कालीन भोजपुर एसओ लाल सिंह डिप्टी एसपी से रिटायर्ड हो चुका है। वह विजयनगर के प्रताप विहार में रहता है। एसआई जोगेंद्र अच्छनेरा आगरा का रहने वाला है, इसने करीब छह माह पहले वीआरएस ले लिया है।
कांस्टेबल सुभाष इंचौली मेरठ का रहने वाला है, जबकि सूर्यभान सराय इनायत इलाहाबाद का। सूर्यभान बांदा में तैनात है। सीबीआई लोक अभियोजक राजन दहिया ने बताया कि सुनवाई के दौरान जोगेंद्र गायब हो गया था, बाद में उसकी अलग से सुनवाई हुई।
उन्होंने बताया कि पुलिस ने मुठभेड़ को सही बताने वाले करीब 35 लोगों के एफिडेविट पेश किए थे। इनमें से कुछ तो कोर्ट में आए ही नहीं, जो लोग आए उनमें से अधिकांश ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने एफिडेविट पर उनसे हस्ताक्षर कराए थे, यानी एफिडेविट भी फर्जी थे।
पुलिस ने मुठभेड़ में युवकों की तरफ से तमंचे से 16 गोलियां चलना बताया था, लेकिन एक भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था। इसकी जांच तत्कालीन सीओ हापुड़ ने की थी। उन्होंने केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन सीबीआई जांच में पुलिस का फर्जीवाड़ा खुल गया। कोर्ट ने पुलिस की मुठभेड़ की कहानी को फर्जी माना है। अब सजा पर बहस होनी है।
मकान-जमीन बेचकर मां ने लड़ी बेटे के लिए ‘जंग’
मां औलाद से बेपनाह मोहब्बत ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसकी खातिर ‘जंग’ भी लड़ती है। फर्जी एनकाउंटर में मारे गए अशोक की बुजुर्ग मां शीला ने 20 साल 103 दिन तक यही लड़ाई लड़ी। इस दौरान उनके पति की मृत्यु हो गई। उन्हें अपना मकान, करीब 8 बीघा जमीन और प्लॉट भी बेचना पड़ा, मगर उन्होंने हार नहीं मानी।
शीला के मुताबिक, अशोक की उम्र 17-18 साल रही होगी। वह सतपुरा की छपाई फैक्ट्री में नौकरी करता था। वह उनका इकलौता बेटा था। उनके तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पुलिस ने शिनाख्त कराए बिना अशोक और तीनों अन्य लड़कों का अंतिम संस्कार कर दिया था।
दो दिन बाद अमर उजाला में युवकों के शवों के फोटो छपे थे, जिसके बाद उन्हें पता चला था कि उनके बेटे को मार दिया गया है। उन्होंने न्याय की खातिर तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा के आवास के बाहर धरना भी दिया था। उन्होंने कहा कि आरोपी पुलिसकर्मियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए, उनके दोषी करार दिए जाने से उन्हें बेहद खुशी है। अशोक की छोटी बहन पुष्पा भी कोर्ट आई हुई थीं।
दूसरे मृतक जलालुद्दीन के पिता मंसूर की भी मृत्यु हो चुकी है। मां शरीफन हैं। कोर्ट पहुंची शरीफन ने बताया कि उनके छह बच्चों में जलालुद्दीन तीसरे नंबर का था। निवाड़ी की फैक्ट्री में नौकरी करता था। उसकी उम्र भी 17-18 साल थी। वह भी तभी से न्याय के लिए शीला के साथ-साथ लड़ाई लड़ रही हैं।
तीसरे मृतक जसवीर के भतीजे अमित कोर्ट आए थे, उन्होंने बताया कि उस समय जसवीर के तीन साल की एक बेटी थी, जो अब 23 साल की है। जसवीर की मौत की बाद उनकी पत्नी की दूसरी शादी करा दी गई थी। जसवीर के दो भाई और हैं। चौथा मृतक प्रवेश भी छपाई फैक्ट्री में नौकरी करता था। प्रवेश का जिक्र आते ही कोर्ट आए उसके पिता महेंद्र सिंह की आंखों से आंसू बह निकले।
कब-कब क्या-क्या हुआ
8 नवंबर 1996- चार युवकों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया
एक फरवरी 1997- सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की
सात अप्रैल 1997- सीबीआई दिल्ली को केस की जांच सौंपी गई
27 अप्रैल 2004- आरोपी पुलिसकर्मी रणवीर की मृत्यु
10 सितंबर 2001- सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट पेश की
20 फरवरी 2017- चार पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया गया
यह थी पुलिस की गढ़ी हुई फर्जी कहानी
भोजपुर पुलिस ने एनकाउंटर की जो फर्जी कहानी गढ़ी थी, वह इस तरह थी। पुलिस केस क्राइम नंबर 138/1996 के चार आरोपियों रणपाल, भगवत, विनोद और सुरेंद्र निवासी दोसा बंजारपुर को लेकर जा रही थी।
8 नवंबर 1996 को शाम करीब साढ़े तीन बजे पुलिस ने देखा खंजरपुर के ईंख के खेत के पास सड़क पर बनी मछरी पुलिया पर चार युवक बैठे थे, जो पुलिस को देखकर मोदीनगर की तरफ चलने लगे। पुलिसकर्मियों ने उन्हें टोकते हुए रुकने को कहा तो उन्होंने पुलिस पर फायरिंग कर दी।
गोलियां पुलिसकर्मियों के कान और कंधे केपास से होकर गुजर गईं। पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें दो युवक मारे गए, जबकि दो गन्ने केखेत में घुस गए। उनकी घेराबंदी करने के लिए भोजपुर और मोदीनगर थाने की पुलिस बुला ली गई।
खेत में भी युवकों ने उन पर फायरिंग की और पुलिसकर्मियों ने भी साहस दिखाते हुए फायर किए, जिसमें दो युवक खेत में मारे गए। इस मामले में लाल सिंह ने एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने अपनी तरफ से करीब 48 राउंड फायरिंग होना बताया था, जो रिवाल्वर, कारबाइन, स्टेनगन, रायफल और एके-47 से चलाई गई थीं।
पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर को इंग्लैंड से बुलाएगी सीबीआई
इस फर्जी एनकाउंटर के दौरान महाराष्ट्र कैडर की पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर की तैनाती गाजियाबाद में थी। वह एएसपी थीं। सीबीआई ने चार्जशीट में उन्हें आरोपी नहीं बनाया था, लेकिन उनकी सरकारी रिवाल्वर से गोली चलने की फोरेंसिक लैब द्वारा पुष्टि होने पर कोर्ट ने उन्हें आरोपी माना था।
14 सितंबर 2007 को उन्हें कोर्ट में तलब किया गया था। उनके कई बार एनबीडब्ल्यू जारी किए गए, मगर वह कभी कोर्ट में पेश नहीं हुईं और इंग्लैड चली गईं। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि वह इंग्लैंड में पढ़ाती हैं।
2012 में उन्होंने वीआरएस ले लिया था। हालांकि सीबीआई ने उन्होंने चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया है। उनके एनबीडब्ल्यू भी कई बार जारी किए जा चुकेहैं। सीबीआई उन्हें फिर से कोर्ट में बुलाने की तैयारी कर रही है।
परिजनों की गुहार.... कातिलों को मिले सजा-ए-मौत
समझौते के लिए पुलिस ने बनाया दबाव
जवान बेटे प्रवेश को याद कर आज भी बूढ़ी मां शीला की आंखों में आंसू आ जाते है। बेटे की तस्वीर को देख उसका हृदय रो पड़ता है। प्रवेश पांच भाईयों में चौथे नंबर पर था। विजयनगर कालोनी की मधुबन कालोनी में रहने वाली 65 वर्षीय वृद्घा शीला बताती है कि धनतेरस को वह पति महेंद्र के साथ शाहदरा एक मौत में गई हुई थी।
लौटने पर बहू सुनीता ने बताया कि देवर प्रवेश को कोई बुलाकर ले गया है। दो दिन तक प्रवेश की खैरखबर नहीं मिलने पर उन्होंने मोदीनगर पुलिस को सूचना दी, मगर पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की।
भैया दूज के दिन पत्रकारों ने आकर बताया कि उनके बेटे को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। अखबार में भी उन्होंने बेटे की फोटो देखी। यह सुनकर परिवार में कोहराम मच गया।
आरोपियों को सजा दिलाने के लिए परिवार खुद का मकान बेचकर किराए के मकान में आ गया है। फर्जी मुठभेड़ का खुलासा होने के बाद पुलिस वालों ने समझौते के लिए रुपये देने का भी लालच दिया था।
तीन बहनों का इकलौता भाई था अशोक
फर्जी एनकाउंटर में मारा गया अशोक पुत्र किशन तीन बहनों में इकलौता भाई था और कातिलों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाते हुए पिता किशन सिंह ने 2008 में दम तोड़ दिया।
मां शीला बताती है कि बेरहमों ने उसके इकलौते बेटे की कनपटी पर गोली मारी थी। समाचार पत्र में मृत बेटे का फोटो देख उसका कलेजा मुंह में आ गया था।
आरोपी दरोगा जोगेंद्र समझौते के लिए आया था।
मगर हमने समझौता से इनकार कर दिया था और आरोपी पुलिस वालों को सजा दिलाने के लिए सरधना मेरठ में स्थित जमीन को बेच दिया था। आज दोषियों का दोष सिद्घ होने के बाद कलेजे को ठंडक पहुंची है। मौजूद बहन पुष्पा, बबली और पूनम की आंखों में आज भी आंसू हैं।
अल्लाह उन पुलिस वालों को मौत दे
विजय नगर कालोनी में रहने वाला जलालुद्दीन 8 नवंबर को फैक्ट्री जाने की बात कहकर घर से निकला था। उसका भाई शकील बताता है कि वह पांच भाई थे, शम्सुद्दीन, शकील, छोटे, जफरूद्दीन, इरफान और जलालुद्दीन।
जलालुद्दीन दूसरे नंबर पर था। घटना के वक्त वह काफी छोटे थे। दो साल पहले मुकदमा लड़ते-लड़ते उसके पिता मंसूर भी दम तोड़ चुके है। मां शरीफन सबकुछ बेचकर मुकदमा लड़ रही है, मगर इस बात की शांति है कि कोर्ट ने देर में ही सही पुलिस वालों को दोषी तो माना है। अब 22 फरवरी का इंतजार है, जब उन बेरहम पुलिस वालों को मौत की सजा सुनाई जाएगी।
समाचार पत्र में बेटे को ‘बदमाश’ पढ़कर कांप गई रूह
मोदीनगर। जसवीर उर्फ पप्पू छपाई की फैक्ट्री में नौकरी करता था। छोटी दीपावली को जसवीर का मृत फोटो समाचार पत्र में देख रूह कांप गई। समाचार पत्र में लिखा था कि मुठभेड़ में मारा गया युवक बदमाश था।
यह पढ़कर हम सहम गए और चुपचाप बैठ गए थे। यह कहना है कि जसवीर के बड़े भाई वीर सिंह और भाभी उमा का। बिसोखर रोड के पास चाय की दुकान करने वाले वीर सिंह ने बताया कि जसवीर की घटना से चार साल पहले ही बबीता से शादी हुई थी और तीन साल की बेटी ज्योति भी थी।
वर्तमान में बबीता ने दूसरी शादी कर ली है जबकि बेटी अपने मामा के पास है। बेटे को न्याय दिलाने के चक्कर में तीन साल जसवीर की मां ब्रह्मकौर भगवान को प्यारी हो चुकी हैं।
‘दोषी’ सुन पीले पड़े पुलिसकर्मियों के चेहरे
जैसे ही पुलिसकर्मियों ने एनकाउंटर को फर्जी मानते हुए उन्हें दोषी करार दिए जाने की बात सुनी, उनके चेहरे पर पीले पड़ गए। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। कुछ देर बाद पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और जेल ले गए।
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8 नवंबर 1996 को भोजपुर पुलिस ने चार युवकों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया था। मारे गए युवक मोदीनगर की विजयनगर कालोनी के जलालुद्दीन, प्रवेश, जसवीर और अशोक थे, जो फैक्ट्री में नौकरी और मजदूरी करते थे।
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मृतकों के परिजनों ने इसे फर्जी मुठभेड़ बताते हुए विरोध प्रदर्शन किया था और सीबीआई जांच की मांग की थी। सात अप्रैल 1997 को सीबीआई को इसकी जांच सौंपी गई थी। 10 सितंबर 2001 को सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट पेश की थी, जिसमें तत्कालीन भोजपुर एसओ लाल सिंह, एसआई जोगेंद्र, कांस्टेबल सुभाष, सूर्यभान और रणवीर को आईपीसी की धारा 302, 149, 193 और 201 के तहत आरोपी बनाया था।
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केस की सुनवाई के दौरान 27 अप्रैल 2004 को रणवीर की मृत्यु हो गई थी। बाकी चारों पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने दोषी करार दिया है। जमानत पर चल रहे लाल सिंह, जोगेंद्र और सुभाष कोर्ट में उपस्थित थे, जिन्हें हिरासत में लेकर डासना जेल भेज दिया गया, जबकि सूर्यभान इलाहाबाद गया हुआ था, वह उपस्थित नहीं हो सका। उसके अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वह गाजियाबाद के लिए रवाना हो गया है। ट्रेन का एक्सीडेंट होने की वजह से उसे देर हो गई है।
प्रमोशन पाने के लिए किया था फर्जी एनकाउंटर
विशेष सीबीआई कोर्ट ने 226 पेज के फैसले में सीबीआई की थ्योरी को सही माना कि भोजपुर फर्जी एनकाउंटर में मारे गए चारों युवक निहत्थे थे। पुलिस उन्हें चाय की दुकान से जीप में उठाकर ले गई थी।
आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने के लिए पुलिसकर्मियों ने दो युवकों को पुलिया पर और दो को ईंख के खेत में मार गिराया था। मुठभेड़ साबित करने के लिए उनके पास तमंचे रख दिए थे और उनसे 16 राउंड फायर किए जाने का दावा किया था। इस मामले में 112 लोगों की गवाही हुई।
दोषी करार दिया गया तत्कालीन भोजपुर एसओ लाल सिंह डिप्टी एसपी से रिटायर्ड हो चुका है। वह विजयनगर के प्रताप विहार में रहता है। एसआई जोगेंद्र अच्छनेरा आगरा का रहने वाला है, इसने करीब छह माह पहले वीआरएस ले लिया है।
कांस्टेबल सुभाष इंचौली मेरठ का रहने वाला है, जबकि सूर्यभान सराय इनायत इलाहाबाद का। सूर्यभान बांदा में तैनात है। सीबीआई लोक अभियोजक राजन दहिया ने बताया कि सुनवाई के दौरान जोगेंद्र गायब हो गया था, बाद में उसकी अलग से सुनवाई हुई।
उन्होंने बताया कि पुलिस ने मुठभेड़ को सही बताने वाले करीब 35 लोगों के एफिडेविट पेश किए थे। इनमें से कुछ तो कोर्ट में आए ही नहीं, जो लोग आए उनमें से अधिकांश ने बताया कि पुलिसकर्मियों ने एफिडेविट पर उनसे हस्ताक्षर कराए थे, यानी एफिडेविट भी फर्जी थे।
पुलिस ने मुठभेड़ में युवकों की तरफ से तमंचे से 16 गोलियां चलना बताया था, लेकिन एक भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था। इसकी जांच तत्कालीन सीओ हापुड़ ने की थी। उन्होंने केस में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, लेकिन सीबीआई जांच में पुलिस का फर्जीवाड़ा खुल गया। कोर्ट ने पुलिस की मुठभेड़ की कहानी को फर्जी माना है। अब सजा पर बहस होनी है।
मकान-जमीन बेचकर मां ने लड़ी बेटे के लिए ‘जंग’
मां औलाद से बेपनाह मोहब्बत ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसकी खातिर ‘जंग’ भी लड़ती है। फर्जी एनकाउंटर में मारे गए अशोक की बुजुर्ग मां शीला ने 20 साल 103 दिन तक यही लड़ाई लड़ी। इस दौरान उनके पति की मृत्यु हो गई। उन्हें अपना मकान, करीब 8 बीघा जमीन और प्लॉट भी बेचना पड़ा, मगर उन्होंने हार नहीं मानी।
शीला के मुताबिक, अशोक की उम्र 17-18 साल रही होगी। वह सतपुरा की छपाई फैक्ट्री में नौकरी करता था। वह उनका इकलौता बेटा था। उनके तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। पुलिस ने शिनाख्त कराए बिना अशोक और तीनों अन्य लड़कों का अंतिम संस्कार कर दिया था।
दो दिन बाद अमर उजाला में युवकों के शवों के फोटो छपे थे, जिसके बाद उन्हें पता चला था कि उनके बेटे को मार दिया गया है। उन्होंने न्याय की खातिर तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा के आवास के बाहर धरना भी दिया था। उन्होंने कहा कि आरोपी पुलिसकर्मियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए, उनके दोषी करार दिए जाने से उन्हें बेहद खुशी है। अशोक की छोटी बहन पुष्पा भी कोर्ट आई हुई थीं।
दूसरे मृतक जलालुद्दीन के पिता मंसूर की भी मृत्यु हो चुकी है। मां शरीफन हैं। कोर्ट पहुंची शरीफन ने बताया कि उनके छह बच्चों में जलालुद्दीन तीसरे नंबर का था। निवाड़ी की फैक्ट्री में नौकरी करता था। उसकी उम्र भी 17-18 साल थी। वह भी तभी से न्याय के लिए शीला के साथ-साथ लड़ाई लड़ रही हैं।
तीसरे मृतक जसवीर के भतीजे अमित कोर्ट आए थे, उन्होंने बताया कि उस समय जसवीर के तीन साल की एक बेटी थी, जो अब 23 साल की है। जसवीर की मौत की बाद उनकी पत्नी की दूसरी शादी करा दी गई थी। जसवीर के दो भाई और हैं। चौथा मृतक प्रवेश भी छपाई फैक्ट्री में नौकरी करता था। प्रवेश का जिक्र आते ही कोर्ट आए उसके पिता महेंद्र सिंह की आंखों से आंसू बह निकले।
कब-कब क्या-क्या हुआ
8 नवंबर 1996- चार युवकों को एनकाउंटर में मार गिराने का दावा किया
एक फरवरी 1997- सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की
सात अप्रैल 1997- सीबीआई दिल्ली को केस की जांच सौंपी गई
27 अप्रैल 2004- आरोपी पुलिसकर्मी रणवीर की मृत्यु
10 सितंबर 2001- सीबीआई ने कोर्ट में चार्जशीट पेश की
20 फरवरी 2017- चार पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया गया
यह थी पुलिस की गढ़ी हुई फर्जी कहानी
भोजपुर पुलिस ने एनकाउंटर की जो फर्जी कहानी गढ़ी थी, वह इस तरह थी। पुलिस केस क्राइम नंबर 138/1996 के चार आरोपियों रणपाल, भगवत, विनोद और सुरेंद्र निवासी दोसा बंजारपुर को लेकर जा रही थी।
8 नवंबर 1996 को शाम करीब साढ़े तीन बजे पुलिस ने देखा खंजरपुर के ईंख के खेत के पास सड़क पर बनी मछरी पुलिया पर चार युवक बैठे थे, जो पुलिस को देखकर मोदीनगर की तरफ चलने लगे। पुलिसकर्मियों ने उन्हें टोकते हुए रुकने को कहा तो उन्होंने पुलिस पर फायरिंग कर दी।
गोलियां पुलिसकर्मियों के कान और कंधे केपास से होकर गुजर गईं। पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें दो युवक मारे गए, जबकि दो गन्ने केखेत में घुस गए। उनकी घेराबंदी करने के लिए भोजपुर और मोदीनगर थाने की पुलिस बुला ली गई।
खेत में भी युवकों ने उन पर फायरिंग की और पुलिसकर्मियों ने भी साहस दिखाते हुए फायर किए, जिसमें दो युवक खेत में मारे गए। इस मामले में लाल सिंह ने एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने अपनी तरफ से करीब 48 राउंड फायरिंग होना बताया था, जो रिवाल्वर, कारबाइन, स्टेनगन, रायफल और एके-47 से चलाई गई थीं।
पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर को इंग्लैंड से बुलाएगी सीबीआई
इस फर्जी एनकाउंटर के दौरान महाराष्ट्र कैडर की पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर की तैनाती गाजियाबाद में थी। वह एएसपी थीं। सीबीआई ने चार्जशीट में उन्हें आरोपी नहीं बनाया था, लेकिन उनकी सरकारी रिवाल्वर से गोली चलने की फोरेंसिक लैब द्वारा पुष्टि होने पर कोर्ट ने उन्हें आरोपी माना था।
14 सितंबर 2007 को उन्हें कोर्ट में तलब किया गया था। उनके कई बार एनबीडब्ल्यू जारी किए गए, मगर वह कभी कोर्ट में पेश नहीं हुईं और इंग्लैड चली गईं। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि वह इंग्लैंड में पढ़ाती हैं।
2012 में उन्होंने वीआरएस ले लिया था। हालांकि सीबीआई ने उन्होंने चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया है। उनके एनबीडब्ल्यू भी कई बार जारी किए जा चुकेहैं। सीबीआई उन्हें फिर से कोर्ट में बुलाने की तैयारी कर रही है।
परिजनों की गुहार.... कातिलों को मिले सजा-ए-मौत
समझौते के लिए पुलिस ने बनाया दबाव
जवान बेटे प्रवेश को याद कर आज भी बूढ़ी मां शीला की आंखों में आंसू आ जाते है। बेटे की तस्वीर को देख उसका हृदय रो पड़ता है। प्रवेश पांच भाईयों में चौथे नंबर पर था। विजयनगर कालोनी की मधुबन कालोनी में रहने वाली 65 वर्षीय वृद्घा शीला बताती है कि धनतेरस को वह पति महेंद्र के साथ शाहदरा एक मौत में गई हुई थी।
लौटने पर बहू सुनीता ने बताया कि देवर प्रवेश को कोई बुलाकर ले गया है। दो दिन तक प्रवेश की खैरखबर नहीं मिलने पर उन्होंने मोदीनगर पुलिस को सूचना दी, मगर पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की।
भैया दूज के दिन पत्रकारों ने आकर बताया कि उनके बेटे को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। अखबार में भी उन्होंने बेटे की फोटो देखी। यह सुनकर परिवार में कोहराम मच गया।
आरोपियों को सजा दिलाने के लिए परिवार खुद का मकान बेचकर किराए के मकान में आ गया है। फर्जी मुठभेड़ का खुलासा होने के बाद पुलिस वालों ने समझौते के लिए रुपये देने का भी लालच दिया था।
तीन बहनों का इकलौता भाई था अशोक
फर्जी एनकाउंटर में मारा गया अशोक पुत्र किशन तीन बहनों में इकलौता भाई था और कातिलों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाते हुए पिता किशन सिंह ने 2008 में दम तोड़ दिया।
मां शीला बताती है कि बेरहमों ने उसके इकलौते बेटे की कनपटी पर गोली मारी थी। समाचार पत्र में मृत बेटे का फोटो देख उसका कलेजा मुंह में आ गया था।
आरोपी दरोगा जोगेंद्र समझौते के लिए आया था।
मगर हमने समझौता से इनकार कर दिया था और आरोपी पुलिस वालों को सजा दिलाने के लिए सरधना मेरठ में स्थित जमीन को बेच दिया था। आज दोषियों का दोष सिद्घ होने के बाद कलेजे को ठंडक पहुंची है। मौजूद बहन पुष्पा, बबली और पूनम की आंखों में आज भी आंसू हैं।
अल्लाह उन पुलिस वालों को मौत दे
विजय नगर कालोनी में रहने वाला जलालुद्दीन 8 नवंबर को फैक्ट्री जाने की बात कहकर घर से निकला था। उसका भाई शकील बताता है कि वह पांच भाई थे, शम्सुद्दीन, शकील, छोटे, जफरूद्दीन, इरफान और जलालुद्दीन।
जलालुद्दीन दूसरे नंबर पर था। घटना के वक्त वह काफी छोटे थे। दो साल पहले मुकदमा लड़ते-लड़ते उसके पिता मंसूर भी दम तोड़ चुके है। मां शरीफन सबकुछ बेचकर मुकदमा लड़ रही है, मगर इस बात की शांति है कि कोर्ट ने देर में ही सही पुलिस वालों को दोषी तो माना है। अब 22 फरवरी का इंतजार है, जब उन बेरहम पुलिस वालों को मौत की सजा सुनाई जाएगी।
समाचार पत्र में बेटे को ‘बदमाश’ पढ़कर कांप गई रूह
मोदीनगर। जसवीर उर्फ पप्पू छपाई की फैक्ट्री में नौकरी करता था। छोटी दीपावली को जसवीर का मृत फोटो समाचार पत्र में देख रूह कांप गई। समाचार पत्र में लिखा था कि मुठभेड़ में मारा गया युवक बदमाश था।
यह पढ़कर हम सहम गए और चुपचाप बैठ गए थे। यह कहना है कि जसवीर के बड़े भाई वीर सिंह और भाभी उमा का। बिसोखर रोड के पास चाय की दुकान करने वाले वीर सिंह ने बताया कि जसवीर की घटना से चार साल पहले ही बबीता से शादी हुई थी और तीन साल की बेटी ज्योति भी थी।
वर्तमान में बबीता ने दूसरी शादी कर ली है जबकि बेटी अपने मामा के पास है। बेटे को न्याय दिलाने के चक्कर में तीन साल जसवीर की मां ब्रह्मकौर भगवान को प्यारी हो चुकी हैं।
‘दोषी’ सुन पीले पड़े पुलिसकर्मियों के चेहरे
जैसे ही पुलिसकर्मियों ने एनकाउंटर को फर्जी मानते हुए उन्हें दोषी करार दिए जाने की बात सुनी, उनके चेहरे पर पीले पड़ गए। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आ रही थीं। कुछ देर बाद पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और जेल ले गए।