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बंटे मुस्लिम वोट...बदलेंगे समीकरण
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Sun, 12 Feb 2017 01:11 AM IST
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मतदान करने पहुंची मुस्लिम महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
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विधानसभा चुनाव के पहले चरण में शनिवार को गाजियाबाद की पांच विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ। वोट ट्रेंड के जानकारों की मानें तो वैसे तो सभी 73 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के वोट बंटे हैं, लेकिन बात करें गाजियाबाद की तो यहां की पांच सीटों पर बंटे वोटों का प्रतिशत कहीं ज्यादा तो कहीं कम रहा। ऐसे में वोटों का यह बंटवारा समीकरण बदलने की ताकत रखता है।
जिला गाजियाबाद के मुस्लिम बहुल इलाकों की बात करें तो कैला भट्टा, इस्लाम नगर, चमन कालोनी, डासना गेट, फर्रुखनगर, अर्थला, हिंडन विहार, पसौंडा, शहीद नगर के अलावा लोनी मुरादनगर और मोदीनगर में भी मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में है।
इसमें पांचों विधानसभा सीटों पर कहीं मुस्लिमों का रुझान गठबंधन की तरफ रहा तो किसी सीट पर हाथी और किसी सीट पर हैंडपंप पर भी जोर रहा। हालांकि इस बिखराव से किसको फायदा होगा, यह तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा।
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कई सीटों पर मुस्लिमों के वोटों का बंटवारा 70 से 30 प्रतिशत बताया जा रहा है तो कई पर ये आंकड़ा 40 से 60 फीसदी तक रहा है। इस हिसाब से पांचों सीटों पर करीब पौने चार लाख मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी गणित को बिगाड़ेगी यह तय हो गया है।
लोनी विधानसभा सीट पर करीब 90 हजार, मुरादनगर सीट पर 53 हजार, मोदीनगर सीट पर 48 हजार, शहर सीट पर 33,555 और साहिबाबाद सीट पर करीब एक लाख 45 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, यानि कुल वोटर्स का15 प्रतिशत।
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सभी प्रत्याशी मुस्लिम वोटों को बटोरने के लिए जुगत लगाते रहे। एन मौके पर कौम की ओर से फतवों का सिलसिला भी चला। समाज के मोअज़िज लोगों ने वोटों के बिखराव को रोकने और किसी भी एक पार्टी को मतदान करने की पुरजोर हिमायत भी की, तकरीरे दी गईं , लेकिन वोटर खामोश रहा।
आलम ये रहा कि वोट डालने के 24 घंटे पहले तक ये चुप्पी नहीं टूटी लेकिन जब आज सुबह वोट पड़ना शुरू हुए तो नतीजे वोटों के बिखराव के तौर पर सामने आए। अमूमन खुलकर दावा करने वाले समाज इस बार यह भी सार्वजनिक करने से बचता दिखा कि अखलियत के वोट आखिर पड़े कहां। मुस्लिम वोटों का विभाजन किस तरह हुआ है और इसका असर कितना पड़ा।
यही हाल साहिबाबाद का भी रहा यहां जब हमने कोशिश की एक मुश्त वोट बैंक की नब्ज टटोलने की तो इस बार अल्पसंख्यक वोटरों में बदलाव भी देखने को मिला। बदले हुए मिजाज ने किसी एक प्रत्याशी को थोक के भाव मत नहीं दिया।
इस सीट पर करीब डेढ़ लाख अल्पसंख्यक वोट विभिन्न प्रत्याशियों के बीच बंटे। खासकर युवा मतदाताओं ने अपने मत के महत्व को समझा और विकास को तरजीह दी। पसौंडा, शहीद नगर, खोडा, डीएलएफ कॉलोनी में 2012 के विस चुनाव में अल्पसंख्यक वोटर्स की एक लाइन थी, जो किसी एक के पक्ष में जाती हुई साफ दिखी थी।
इस बार यह बंटी हुई थी। पसौंडा में कुछ महिला मतदाताओं ने कहा कि हमें इस बार घर में यह नहीं कहा गया कि फलां को ही वोट डालना है, क्योंकि पिछली बार जिस पार्टी को वोट किया था, उस पार्टी का प्रत्याशी इस बार क्षेत्र में दिखा ही नहीं।
वहीं, कुछ युवा मतदाताओं ने कहा कि हमें पता है कि कौन पार्टी हमारे भविष्य के लिए हितकर है, हमने उसी पार्टी को चुना है। हालांकि कुछ बुजुर्ग मतदाताओं ने कहा कि नई जमात की नई सोच है, उन्हें कौन समझाए।
अल्पसंख्यकों के वोट बैंक में सेंध लगने के क्या मायने होंगेयह अलग बात है। इसी के साथ ये भी क्लीयर हो गया है कि अब कौम और धर्म का भय दिखाकर एक मुश्त वोटरों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं ,क्योंकि अब युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ गया है, वह विकास के साथ स्थानीय मुद्दों को तरजीह दे रहे हैं। कम से कम आज का पोल तो इसी ओर इशारा कर रहा है।
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जिला गाजियाबाद के मुस्लिम बहुल इलाकों की बात करें तो कैला भट्टा, इस्लाम नगर, चमन कालोनी, डासना गेट, फर्रुखनगर, अर्थला, हिंडन विहार, पसौंडा, शहीद नगर के अलावा लोनी मुरादनगर और मोदीनगर में भी मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में है।
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इसमें पांचों विधानसभा सीटों पर कहीं मुस्लिमों का रुझान गठबंधन की तरफ रहा तो किसी सीट पर हाथी और किसी सीट पर हैंडपंप पर भी जोर रहा। हालांकि इस बिखराव से किसको फायदा होगा, यह तो रिजल्ट आने पर ही पता चलेगा।
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कई सीटों पर मुस्लिमों के वोटों का बंटवारा 70 से 30 प्रतिशत बताया जा रहा है तो कई पर ये आंकड़ा 40 से 60 फीसदी तक रहा है। इस हिसाब से पांचों सीटों पर करीब पौने चार लाख मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी गणित को बिगाड़ेगी यह तय हो गया है।
लोनी विधानसभा सीट पर करीब 90 हजार, मुरादनगर सीट पर 53 हजार, मोदीनगर सीट पर 48 हजार, शहर सीट पर 33,555 और साहिबाबाद सीट पर करीब एक लाख 45 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, यानि कुल वोटर्स का15 प्रतिशत।
पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सभी प्रत्याशी मुस्लिम वोटों को बटोरने के लिए जुगत लगाते रहे। एन मौके पर कौम की ओर से फतवों का सिलसिला भी चला। समाज के मोअज़िज लोगों ने वोटों के बिखराव को रोकने और किसी भी एक पार्टी को मतदान करने की पुरजोर हिमायत भी की, तकरीरे दी गईं , लेकिन वोटर खामोश रहा।
आलम ये रहा कि वोट डालने के 24 घंटे पहले तक ये चुप्पी नहीं टूटी लेकिन जब आज सुबह वोट पड़ना शुरू हुए तो नतीजे वोटों के बिखराव के तौर पर सामने आए। अमूमन खुलकर दावा करने वाले समाज इस बार यह भी सार्वजनिक करने से बचता दिखा कि अखलियत के वोट आखिर पड़े कहां। मुस्लिम वोटों का विभाजन किस तरह हुआ है और इसका असर कितना पड़ा।
यही हाल साहिबाबाद का भी रहा यहां जब हमने कोशिश की एक मुश्त वोट बैंक की नब्ज टटोलने की तो इस बार अल्पसंख्यक वोटरों में बदलाव भी देखने को मिला। बदले हुए मिजाज ने किसी एक प्रत्याशी को थोक के भाव मत नहीं दिया।
इस सीट पर करीब डेढ़ लाख अल्पसंख्यक वोट विभिन्न प्रत्याशियों के बीच बंटे। खासकर युवा मतदाताओं ने अपने मत के महत्व को समझा और विकास को तरजीह दी। पसौंडा, शहीद नगर, खोडा, डीएलएफ कॉलोनी में 2012 के विस चुनाव में अल्पसंख्यक वोटर्स की एक लाइन थी, जो किसी एक के पक्ष में जाती हुई साफ दिखी थी।
इस बार यह बंटी हुई थी। पसौंडा में कुछ महिला मतदाताओं ने कहा कि हमें इस बार घर में यह नहीं कहा गया कि फलां को ही वोट डालना है, क्योंकि पिछली बार जिस पार्टी को वोट किया था, उस पार्टी का प्रत्याशी इस बार क्षेत्र में दिखा ही नहीं।
वहीं, कुछ युवा मतदाताओं ने कहा कि हमें पता है कि कौन पार्टी हमारे भविष्य के लिए हितकर है, हमने उसी पार्टी को चुना है। हालांकि कुछ बुजुर्ग मतदाताओं ने कहा कि नई जमात की नई सोच है, उन्हें कौन समझाए।
अल्पसंख्यकों के वोट बैंक में सेंध लगने के क्या मायने होंगेयह अलग बात है। इसी के साथ ये भी क्लीयर हो गया है कि अब कौम और धर्म का भय दिखाकर एक मुश्त वोटरों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं ,क्योंकि अब युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ गया है, वह विकास के साथ स्थानीय मुद्दों को तरजीह दे रहे हैं। कम से कम आज का पोल तो इसी ओर इशारा कर रहा है।
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