इस गांव के गैंगस्टर बच्चों को भेजना चाहते हैं विदेश
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अपराध लड़ाई खून खराबा और रंजिश इन सबके बीच जिंदगी यूं ही खत्म हो गई। हाथों में खिलौनों की जगह बंदूकों ने बचपन छीन लिया पर अब और नहीं। ये नहीं चाहते कि जिंदगी ने जिस गैंगवार के मुकाम पर इन्हें लाकर खड़ा किया है उनके बच्चे भी वही जिंदगी बिताएं।
कहानी नजफगढ़ की है। उस नजफगढ़ की जहां के पूर्व विधायक को दिल्ली में गोलियों से भून दिया गया। इस जगह की कहानी में जिंदा है। एक गैंगवार जिसने दो दशकों से लाशों का खेल खेला है।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से दक्षिण पश्चिमी इलाके के इस क्षेत्र में दशकों से हर साल किसी ना किसी गैंग के सदस्य को जान गंवानी पड़ती है।
गैंगवार के बाद डर के साए में है इलाका
भरत सिंह की हत्या के बाद इलाके में एक बार फिर से गैंगवार का साया मंडराने लगा है। यहां के लोगों की बातों पर विश्वास करें तो जमीन के विवाद में लगभग 20 लोग गैंगवार के साए में जान गंवा चुके हैं।
भरत सिंह की बेटी और दो बेटे सांस्कृतिक अनुष्टान के लिए दिल्ली आए थे। भरत सिंह के भाई कृष्ण पाल कहते हैं कि उन्हें कुछ दिनों के बाद उनके बोर्डिंग स्कूल में वापस भेज दिया जाएगा।
परिवार ने तय किया है कि वो अपने बच्चों को अपने दुश्मनों से दूर उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजेंगे। नजफगढ़ के माने जाने वाले पहवान कहते हैं कि जिस गैंगवार ने उनके भाई की जान ली है, वो नहीं चाहते आने वाली पीढ़ी भी उसके साए में जिए।
गोलियां से भूना था भरत सिंह को
भरत सिंह को आठ हथियार बंद लोगों के द्वारा गोलिया से भूनकर मार दिया गया था। बदमाश पांच मिनट तक वहां रुके रहे जिससे कि ये देख सकें कि भरत सिंह जिंदा है या नहीं। फिर उसके बाद वो लोग वहां से चले गए।
घरवालों और पुलिस का मानना है कि इस हत्या के मामले में गांव के ही एक मजबूत शख्स उदयवीर का हाथ है जिसने 2012 में भरत सिंह पर जानलेवा हमला करवाया था।
वहीं स्थानीय विरोधाभास ये है कि उदयवीर कभी आपराधिक गतिविधियों में शामिल नहीं रहा। वो मानता है कि उसके पिता और चाचा की मौत के पीछे पहलवान का हाथ है जो कि जुर्म की दुनिया का एक बेहतर विद्यार्थी है।
अब और लाशों का ढेर नहीं ढोना चाहते
गांव के एक शख्स की मानें तो वैसे तो उदयवीर अब तक किसी भी आपराधिक मामले में शरीक ना रहा हो, लेकिन उसके इस बदले के कदम ने उसे अपराध की दुनिया में एक अच्छा स्टूडेंट साबित कर दिया है।
सिंह का परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहता था। उसका भविष्य संवारना चाहता था। ऐसे में उसने भरत सिंह को मारकर पुराने सारे हिसाब चुक्ता कर दिए।
भले ही अपराध और लाशें इनका साथ ना छोड़े, लेकिन गांव के लोग अब लाशों के ढेर को ढोना नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि विदेश में उगते सूरज के साथ चमककर उनके बच्चे इस खूनखराबे से दूर हो सकते हैं।