'5 पैसे' की हेरा-फेरी के लिए 41 साल से मुकदमा जारी
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डीटीसी ने माना कि 41 वर्ष पहले यात्री को संवाहक द्वारा पांच पैसे कम की टिकट देने के मामले में वह अब तक करीब 48 हजार रुपये मुकदमे पर खर्च कर चुकी है।
डीटीसी ने स्पष्ट किया कि संवाहक को ऐसे ही कई मामलों में लापरवाही करने के कारण बर्खास्त किया गया था और वह अपने निर्णय पर कायम है। डीटीसी ने यह जानकारी हाईकोर्ट को दी।
न्यायमूर्ति हीमा कोहली के समक्ष पेश डीटीसी के अधिवक्ता ने अदालत के पूछने पर बताया कि वर्ष 1982 से अब तक इस मामले में पर 47 हजार 795 रुपये खर्च हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि संवाहक ने 1973 में यात्री से 15 पैसे के टिकट की अपेक्षा 10 पैसे का टिकट दिया था।
कब होगा फैसला
कई अन्य मामलों में भी उसे यात्रियों को बिना टिकट यात्रा करने की इजाजत देते हुए पाया गया था और इसी कारण 15 जुलाई 1976 में उसे बर्खास्त कर दिया गया।
संवाहक रणवीर सिंह ने श्रम अदालत में फैसले को चुनौती दी। श्रम अदालत ने उसे बहाल करने का निर्देश दिया जिसे डीटीसी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी वर्ष 2008 में संवाहक के हक में फैसला दिया।
लेकिन डीटीसी ने पुन: याचिका दायर कर कहा कि संवाहक को रवैया काफी खराब रहा है और उसे नौकरी पर नहीं रखा जा सकता। उसने सरकार से धोखाधड़ी की है।
उन्होंने कहा कि सिंह को वेतन भत्ते इत्यादि के रूप में करीब चार लाख रुपये में से पहले डेढ़ लाख रुपये दे दिए गए थे। अब मात्र दो लाख 72 हजार रुपये ही बकाया हैं। अदालत ने मामले की सुनवाई 19 जनवरी 2015 तय की है।