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पढ़िए, 400 साल पुराने शहर की दुर्दशा LIVE

Tue, 09 Sep 2014 03:44 AM IST
Updated Tue, 09 Sep 2014 03:44 AM IST
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faridabad city is not getting any development.

राष्ट्रीय राजधानी से सटा लगभग सवा चार सौ साल पुराना शेख फरीद का यह ऐतिहासिक शहर अपने उद्योगों के लिए मशहूर है। लेकिन जैसे-जैसे इस शहर का विस्तार हो रहा है, यहां प्रवासी आ रहे हैं, समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं।

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प्रदेश का सबसे पुराना औद्योगिक शहर आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए ही जद्दोजहद कर रहा है। सड़क, पानी, बिजली के लिए आए दिन लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। आजादी के बाद से अब तक यह शहर कांग्रेस डोमिनेटेड रहा है।
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यहां के विधायक कई बार मंत्री रहे हैं। इस समय जिले की छह विधानसभा सीटों में से चार के विधायक सत्ताधारी कांग्रेस के हैं। एनआईटी में निर्दलीय विधायक भी सरकार का हिस्सा हैं। इसके बाद भी शहर की हालत खस्ता है। पढ़िए 'अमर उजाला' संवाददाता ओम प्रकाश की खास रिपोर्ट:
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खराब सड़कें, सीवरेज और गंदगी करती है शर्मसार

faridabad city is not getting any development.

जिले के सबसे बड़े हिस्से में विकास कार्य करवाने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। इसका सालाना बजट करीब हजार करोड़ रुपये का होता है। फिर भी शहर गढ्ढों में तब्दील है। यूं कहें कि लोग सड़क के रूप में मौत के गड्डों पर सवार हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। पिछले दो साल में कई घटनाएं गड्ढों में गिरकर घायल एवं मौत होने की हुई हैं।

शहर में सड़कें कम, गड्ढे ज्यादा हैं। सड़क बनती नहीं कि उखड़ने लगती है। नगर निगम में विजिलेंस कमेटी के मुखिया का पद निगम सदन में विपक्ष के नेता ओम प्रकाश रक्षवाल के पास है। वह तिगांव सीट से भाजपा की टिकट के दावेदार हैं, लेकिन वे सत्ताधारी पार्षदों की तरह निगम के भ्रष्टाचार वाले पहलुओं पर चुप्पी साधे हुए हैं।

सीवर ओवरफ्लो होना और जलभराव शहर की दूसरी बड़ी समस्या है। दो बूंद पानी बरसते ही शहर की सड़कें तालाब का रूप धारण कर लेती हैं। जगह-जगह सीवर का गंदा पानी सड़कों पर जमा रहता है। गांवों की हालत बद से बदतर है। चाहे वह केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर का गांव मेवला महाराजपुर हो या फिर वीरों का गांव तिगांव। सड़कों पर फैला गंदा पानी, बिजली और पानी संकट आम है।

सत्ता का सुख भोग रहे हैं विधायक

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सियासत की बात करें तो सिर्फ  तिगांव को छोड़कर पांचों विधानसभा क्षेत्रों के विधायक सत्ता सुख भोग रहे हैं। बड़खल विधानसभा क्षेत्र के विधायक महेन्द्र प्रताप राज्य के कैबिनेट मंत्री हैं। एनआईटी के विधायक शिवचरण लाल शर्मा स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री हैं। बल्लभगढ़ की विधायक शारदा राठौर मुख्य संसदीय सचिव हैं।

इन सबके बावजूद जिले की स्थिति बदतर है। ऐसा नहीं है कि विकास कार्यों की घोषणाओं की कमी है। पेयजल आपूर्ति की 499 करोड़ रुपये की परियोजना सात साल में भी सिरे नहीं चढ़ पाई है। मंत्री जी अब तक बड़खल झील में पानी नहीं भरवा पाए। ऐतिहासिक सूरजकुंड भी सूखा पड़ा है। उसके बदले नेता रुपयों से तर हो रहे हैं।

सिटी बस सेवा दम तोड़ रही है। 150 में से 80 बसें कबाड़ हो गई हैं। वह आने के बाद चली ही नहीं। क्योंकि जब मंगाई गईं तो साल भर तक ड्राइवर नहीं मिले। बाइपास अभी पूरा बना नहीं कि टूटने लगा है। शहरी गरीबों को आवास देने की योजना दम तोड़ रही है। ईएसआई मेडिकल कॉलेज 2012 में शुरू होना था लेकिन अब तक तैयार नहीं है।

ऐसी कई घोषणाएं हैं जोकि धरातल पर उतरने के बाद थम सी गई हैं। बरसाती पानी निकासी की योजना हो या फिर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और कूड़ा निस्तारण का काम, सभी ऐसे ही रास्ते पर हैं। शहर को हजारों करोड़ रुपये का राजस्व देने वाले औद्योगिक क्षेत्रों की सड़कों की हालत खराब हैं।

...इसलिए चौपट है यहां का रोजगार

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सरकार पिछले दस साल में 500 औद्योगिक प्लॉट भी तैयार कर नहीं दे पाई है। कोई मदर यूनिट नहीं आई। गंदगी की भरमार है। जाम की समस्या आम है। शहर में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां सीवर जाम और गंदगी न हो। पेयजल संकट को लेकर पूरे शहर में हाहाकार मचा हुआ है।

शहर में रोजाना करीब 3000 लाख लीटर पानी की मांग है, जिसमें से मुश्किल से 2000 लाख लीटर की आपूर्ति हो पाती है। इसलिए एक बड़ी आबादी को पानी माफियाओं के भरोसे जिंदगी गुजारनी पड़ती है।

फरीदाबाद इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व प्रधान डॉ. एसके गोयल का कहना है कि जब बायर (खासकर विदेशी खरीदार) यहां की इंडस्ट्रियल सड़कों की हालत देखते हैं तो नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं। भले ही कंपनी में वर्ल्डक्लास का माल बन रहा हो, लेकिन घटिया इंफ्रास्ट्रक्चर देखकर इमेज खराब हो रही है। जिसका उद्योग जगत को नुकसान पहुंच रहा है।

कई बार खरीदार वापस चले गए हैं। इसलिए अब उद्योगपति कोशिश करते हैं कि बड़े खरीदारों से दिल्ली में ही मीटिंग करें। पर जब खरीदार फैक्ट्री देखने की जिद करते हैं तो रास्ते में हमें टूटी सड़कों एवं गंदगी की वजह से शर्मिंदा होना पड़ता है।

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