100 साल बाद भी बरकरार है इस मेडल की चमक
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पूरी दुनिया को हिलाकर रख देने वाले प्रथम विश्व युद्ध को लोग बेशक भूल चुके हों लेकिन तिगांव (फरीदाबाद) के 73 वर्षीय रतन सिंह इसे आज भी जिंदा रखे हुए हैं। क्योंकि उनके पिता राम स्वरूप इस इतिहास के हिस्सा रहे हैं।
ब्रिटिश शासन ने उन्हें इस युद्ध अभियान में वीरता का परिचय देने के लिए विजय पदक से सम्मानित किया था।
यह मेडल 100 साल बाद भी तिगांव के इस परिवार के पास जिंदा है। चार पीढ़ियों में न जाने कितने लोगों के हाथ यह मेडल गया लेकिन इसकी चमक धूमिल नहीं पड़ी।
राम स्वरूप का लिखा है नाम
उन्हें यूनाइटेड किंगडम अभियान पदक मिला था। जिसे मित्र देशों का विजय पदक भी कहा जाता था। यह कांस्य डिस्क 36 एमएम व्यास का है। उस पर राम स्वरूप का नाम भी लिखा है।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में रतन सिंह कहते हैं कि एक चांदी का भी मेडल था, जिसे किसी वजह से उनके पिता को बेचना पड़ा। उनके पिता का 1967 में देहांत हो गया। उससे पहले उन्हें लड़ाई लड़ने के बदले 20 रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती थी।
बीमार पड़े तो सरकारी खर्चे पर इलाज हुआ। लेकिन पिता की मौत के बाद किसी ने नहीं पूछा। न तो सरकार ने और न ही नेताओं ने। उनके पिता देश की आजादी की चाहत लिए इंग्लैंड की ओर से लड़े थे। उस समय उन्होंने सरकार से कुछ लेने के लिए लड़ाई नहीं लड़ी। इसलिए अब भी सरकारों से उम्मीद नहीं।
बडे़ बेटे चरण सिंह ने लड़ी 1965 और 71 की लड़ाई
राम स्वरूप के बड़े बेटे चरण सिंह की उम्र इस समय लगभग 80 वर्ष है। भारतीय सेना में रहकर उन्होंने 1965 और 1971 की लड़ाई लड़ी।
चरण सिंह बताते हैं कि उनके पिता खाड़ी देशों में 1914 से 1917 तक तैनात रहे। उनके दोनों बेटों की उम्र इतनी हो चुकी है कि अब उन्हें पिता की बहादुरी की कहानियां याद नहीं आतीं।
धुंधली हो चुकी यादों के बावजूद उन्हें इस बात का हमेशा गर्व रहता है कि वह ऐसे जांबाज की संतान हैं, जिन्होंने अपने युद्ध कौशल से दुनिया को लोहा मनवाया।