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पटाखे, पराली की बात होती है पर वाहनों के प्रदूषण की बात कोई नहीं करता : सुप्रीम कोर्ट

Thu, 20 Feb 2020 02:19 AM IST
Mohit Mudgal अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Mohit Mudgal Updated Thu, 20 Feb 2020 02:19 AM IST
सार

  • कोर्ट ने इच्छा- प्रदूषण रोकने के तरीके सुझाने कोर्ट आएं परिवहन मंत्री
  • एएसजी बोले, ऐसा आदेश दिया तो उसका राजनीतिक इस्तेमाल होगा

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everybody talks about pollution from Firecrackers, stubble, but no one about pollution of vehicles
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : social media

विस्तार

प्रदूषण मामले में दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कहा है कि लोग पटाखे न चलाने की बात करते हैं, पराली न जलाने की बात करते हैं लेकिन कोई वाहनों से होने वाले प्रदूषण की बात नहीं करता। सार्वजनिक और निजी वाहनों से होने वाले प्रदूषण का प्रभाव न सिर्फ दिल्ली-एनसीआर बल्कि पूरे देश पर है। इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) एसए बोबडे ने इच्छा जताई कि केंद्रीय परिवहन मंत्री प्रदूषण रोकने के लिए उपायों की जानकारी कोर्ट को दें।

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सीजेआई बोबडे ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एएनएस नादकर्णी से पूछा, क्या केंद्रीय मंत्री चर्चा के लिए आ सकते हैं? सीजेआई ने कहा, हम ई-वाहनों की खरीद व चार्जिंग से संबंधित आधारभूत सुविधाओं की व्यवस्था को लेकर परिवहन मंत्री (नितिन गडकरी) से बातचीत की इच्छा रखते हैं। आपके मंत्री इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। हम उनका पक्ष सुनना चाहते हैं।
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इस पर नादकर्णी ने कहा, अगर कोर्ट ऐसा आदेश देता है तो उसका राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि नेताओं के कोर्ट के सामने पेश होने में कुछ गलत नहीं है। इस पर पीठ ने कहा, हम समझते हैं कि याचिकाकर्ता एनजीओ सीपीआईएल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण राजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन वह इस पर मंत्री से जिरह नहीं करेंगे। दरअसल, इस याचिका में नीति आयोग द्वारा तैयार 2012 इलेक्ट्रिक वाहन नीति के अनुपालन करने की मांग की गई है।
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उनसे बात करेंगे जिन्हें फैसले लेने का हक

पीठ ने कहा, यह मसला पटाखे चलाने और पराली जलाने सहित अन्य मुद्दों से जुड़ा है। लोग पटाखे के खिलाफ जा रहे है, जो वर्ष में एक बार होता है लेकिन वाहनों से प्रदूषण नियमित है। कोई इसकी बात नहीं करता। इसका उपाय जरूरी है। हम ई-वाहनों पर उन अथॉरिटी से मिलकर विचार करेंगे, जिन्हें फैसले लेने का अधिकार है। अब इस मामले पर सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी।

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