हर तीसरे मरीज को मिल रही है गलत दवा
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एम्स के मरीजों पर किया गया एक अध्ययन आपको चौका सकता है। इस अध्यय के मुताबिक टीबी के हर तीसरे मरीज को गलत दवा दी जा रही है।
ये अध्ययन एम्स की ओर से 400 से अधिक मरीजों पर किया गया था। इसके परिणाम को अमेरिका के जर्नल ऑफ क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित भी किया गया है। इस रिपोर्ट के परिणाम के मुताबिक यह एक चिंता का विषय है।
अध्ययन में बात सामने आई है कि जीन जांच कर टीबी का पता कर मरीजों को जो दवा दी जा रही है, उसके 35 फीसदी परिणाम गलत पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में हर तीसरे मरीज को गलत दवा दी जा रही है।
'टीबी की जीन जांच पर हो प्रतिबंध'
एम्स के क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड मॉडिक्यूर मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. सरमन सिंह ने बताया कि वर्ष 2012-13 में 400 से अधिक मरीजों के नमूनों की जांच की गई थी। इन पर एमजीआईटी लिक्विड कल्चर, एलपीए और जीन एक्सपर्ट परीक्षण कर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया गया।
इसमें लिक्विड कल्चर व लाइन प्रोब एस्से (एलपीए) जांच 100 फीसदी सही पाई गई। दोनों ही परीक्षणों से प्राप्त अंतिम परिणाम समान थे, लेकिन जीन जांच के परिणामों में 35 फीसदी गलती पाई गई। यह जांच अफ्रीकी देशों में उपयुक्त है, लेकिन भारत जैसे देश में यह कारगर नहीं है।
डॉ. सरमन ने बताया कि जांच के बाद जो परिणाम सामने आते हैं, उनके अनुसार ही मरीजों को दवा दी जाती है, लेकिन जांच रिपोर्ट में टीबी बीमारी का सही स्टेज पता नहीं चल पाता। इसी वजह से 35 फीसदी मरीजों को गलत दवा मिल रही है। इसलिए फिलहाल टीबी की जीन जांच पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए और इसकी जगह लिक्विड कल्चर और एलपीए जांच की जानी चाहिए।