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एनएमसी बिल के विरोध में डॉक्टरों की हड़ताल तेज, एम्स-सफदरजंग में इलाज के लिए भटक रहे मरीज

Thu, 01 Aug 2019 02:16 PM IST
Prachi Priyam अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Published by: Prachi Priyam Updated Thu, 01 Aug 2019 02:16 PM IST
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Doctors strike against National Medical Commission Bill
नेशनल मेडिकल कमीशन बिल 2019 - फोटो : ANI

(NMC, 2019) के विरोध में डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल तेज कर दी है। आज गुरुवार को इस हड़ताल में इमरजेंसी सेवाओं को भी शामिल कर लिया गया है, जिससे मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी के एम्स, सफदरजंग, राम मनोहर लोहिया जैसे प्रमुख अस्पतालों के रेजिडेंट डॉक्टरों के द्वारा बुलाई गई इस हड़ताल से स्थिति गंभीर हो गई है और लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि बिल के विवादित प्रावधानों के लागू होने से देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इससे मेडिकल की पढ़ाई करना महंगा हो जायेगा और भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी गिरेगी। हड़ताल के आगे बढ़ाने के समय और इसके स्वरूप पर आज शाम बैठक में निर्णय लिया जा सकता है। 

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इससे पूर्व, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने बुधवार को 24 घंटे की हड़ताल का आयोजन किया था। उसकी इस हड़ताल में देश भर के लाखों डॉक्टर और अस्पताल शामिल हुए थे। आईएमए भी अपना विरोध आगे बढ़ाने का फैसला कर सकता है।

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बिल के किस प्रावधान का है विरोध

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक 2019 (National Medical Commission Bill, 2019) आज संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में पेश किये जाने की संभावना है। यह निचले सदन लोकसभा से पहले ही पास किया जा चुका है। इस तरह, राज्यसभा से पास होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही यह कानून बन जायेगा। लेकिन डॉक्टरों ने इसके कुछ प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। सबसे ज्यादा विरोध बिल के सेक्शन 32 को लेकर है जिसमें आयुर्वेद, होम्योपैथी और आयुष डॉक्टरों को छह महीने की विशेष ट्रेनिंग देने के बाद कुछ सीमित बीमारियों के मामले में एलोपैथी की दवाएं लिखने का अधिकार दिए जाने की बात कही गई है।

 इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट (इलेक्ट) राजन शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि यह सीधे-सीधे झोलाछाप डॉक्टरों को मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का लाइसेंस देने जैसा है। सरकार ने कुछ सीमित बीमारियों के मामले में अन्य डॉक्टरों को भी एलोपैथी की दवाएं लिखने का अधिकार देने की बात कही है, लेकिन कोई मरीज यह कैसे समझ पायेगा कि उसे किस प्रकार की बीमारी है और उसे इसके इलाज के लिए किसी आयुष डॉक्टर के पास जाना चाहिए या नहीं? अपने क्लीनिक में बैठकर कोई डॉक्टर अन्य बीमारियों की दवाएं भी लिखना शुरू कर देता है, जिसके बारे में उसे जानकारी नहीं है, तो इस प्रकार का अपराध सरकार कैसे रोक पायेगी?

दूसरी बात, बिल के सेक्शन 10 (1) में प्राइवेट मेडिकल कोलेजों के आधे छात्रों की फीस तय करने का अधिकार कॉलेजों को ही देने की बात कही गई है। इस तरह सीधे-सीधे अमीर घरों के बच्चे मेडिकल की सीटें 'खरीद' कर पढ़ाई करेंगे। इस तरह बनने वाले डॉक्टरों की योग्यता संदेह के घेरे में आती है। 

 बिल के सेक्शन चार में कमीशन की संरचना की बात की गई है जिसमें राज्यों का प्रतिनिधत्व बारह से अठारह साल बाद आएगा। इससे महत्वपूर्ण मौकों पर उनकी आवाज नहीं उठाई जा सकेगी। जबकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में सभी राज्यों को प्रतिनिधित्व दिया गया था। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के उलट नए बिल के सेक्शन 8(3) में सेक्रेटरी जनरल की भूमिका भी खत्म कर दी गई है।

 बिल के सेक्शन 15 में एग्जिट टेस्ट की व्यवस्था की गई है जिससे योग्य लोग ही डॉक्टर बन सकें, लेकिन लगभग 4.5 वर्ष की पढ़ाई में एक एमबीबीएस करने वाला डॉक्टर हर छह महीने पर टेस्ट देता है। लंबी प्रक्रिया के बाद वह एमबीबीएस पूरी करता है। ऐसे में इसके बाद उसे एक और एग्जाम देने के लिए मजबूर करना उचित नहीं है। इस दौरान वह लगातार बेरोजगार बना रहेगा, जिसका खर्च उसे ही उठाना पड़ेगा। साथ ही, अगर कोई छात्र एक बार में एग्जिट टेस्ट पास नहीं कर पाता है तो उसके बाद की स्थिति भी क्लियर नहीं की गई है। अभी तक यह परीक्षा केवल विदेश से डिग्री लेकर आने वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स के लिए ही थी। 

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