शपथ से पहले मोदी के फैसले की मुख़ालफ़त
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के राजनयिकों के आने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आने से जहां शिवसेना में नाराजगी दिख रही हैं, वहीं श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को बुलाए जाने के विरोध में तमिलनाडु की राजनीति की दो चिर प्रतिद्वंद्वी पार्टियां भी एकजुट हो गई हैं।
श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के भारत के पीएम नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से नाराज एमडीएमके और एआईडीएमके के लोगों को जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया।
ये है विरोध की मुख्य वजह!
एमडीएमएके प्रमुख ने कहा कि राजपक्षे की मौजूदगी मोदी के शपथ ग्रहण समारोह की पवित्रता को नष्ट कर देगी। उन्होंने आरोप लगाया कि राजपक्षे ने श्रीलंका में तमिलों का नरसंहार किया है।
वाइको ने यह भी बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने शपथ ग्रहण करने के दौरान श्रीलंकाई राष्ट्राध्यक्ष को नहीं बुलाया था। उन्होंने कहा कि निवर्तमान पीएम मनमोहन सिंह ने भी अपने शपथ ग्रहण समारोह के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति को आमंत्रण नहीं भेजा था।
हालांकि वाइको ने कहा कि वह नई सरकार के खिलाफ नहीं हैं और उन्होंने आज प्रधानमंत्री के रुप में शपथ लेने वाले नरेंद्र मोदी को बधाई दी।
किस ने कहा ये ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है?
श्रीलंकाई राष्टपति राजपक्षे के प्रशासन की मुखर विरोधी एडीएमके पहले ही राजपक्षे को आमंत्रिक किये जाने के फैसले को गलत ठहरा चुकी है।
इस मामले में जयललिता ने पहले ही कहा था कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन से तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच चले आ रहे तनावपूर्ण संबंध में कोई बदलाव नहीं आने वाला है।
अन्नाद्रमुक प्रमुख और मुख्यमंत्री जयललिता ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार देते हुए पहले से दुखी तमिलों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा बताया था। प्रदर्शन कर रहे लोगों का आरोप है कि मोदी को इस संबंध में तमिल लोगों की भावना को समझना चाहिए और इससे से बचना चाहिए था।