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नोटबंदी: भुखमरी की कगार पर परिवार, आईडी प्रूफ नहीं होने से बचा पैसा हुआ बेकार

Fri, 18 Nov 2016 10:19 AM IST
शाहनवाज आलम/अमर उजाला, गुड़गांव
शाहनवाज आलम/अमर उजाला, गुड़गांव Updated Fri, 18 Nov 2016 10:19 AM IST
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demonetization: due to lack of id proof a family money is going to waste and they are starving
नेपाली पर‌िवार का नहीं है आईडी प्रूफ - फोटो : अमर उजाला

नेपाल के 71 वर्षीय प्रेम बहादुर की जेब में पैसे तो हैं, लेकिन वह इनके लिए महज एक कागज का टुकड़ा हैं। क्योंकि उन पैसों से वह राशन नहीं ला पा रहे हैं। बीते एक सप्ताह में बचा सामान भी खत्म होने लगा है। जिससे भूखे रहने की नौबत आ गई है। अब प्रेम बहादुर को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर करें तो क्या करें?

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नेपाल की राजधानी काठमांडू से 300 किलोमीटर दूर अर्घखांची के रहने वाले प्रेम बहादुर गुरुग्राम के सरस्वती कुंज में अपने बेटे, बहू और पोते के साथ रहते हैं। छह बाय आठ के कमरे में रहने वाले प्रेम बहादुर की तंगहाल स्थिति उनके घर से मालूम होती है। छोटी सी खाट है परिवार के लिए सोने का भी इंतजाम नहीं है। लोगों के आने पर उसी खाट पर जगह देते हैं।
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अमर उजाला की टीम ने जब उनसे बात की तो घर की आर्थिक तंगी की दास्तां उनकी आंखों से बयां हो गई। रसोइयां का काम करने वाले प्रेम बहादुर का मंझला बेटा खेम बहादुर कहते हैं, 05 तारीख को 11 हजार रुपये तनख्वाह मिली थी।

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माल‌‌िक ने दोबारा दे दी है एडवांस सैलरी

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मालिक ने भी इस महीने दोबारा एडवांस में तनख्वाह दे दी है। कुछ पैसा बचाकर संभाल कर रखा था। अचानक नोटबंदी के कारण अब वो पैसा नहीं रह गया। जहां से राशन लेता था, वो भी नहीं ले रहा है। मालिक से बदलवाने कहा तो वह आईडी लाने को कहते हैं। साहब हमारे पास तो आईडी भी नहीं है। न ही बैंक अकाउंट। अब क्या करें? आप ही कुछ बता दो।

बकौल खेम बहादुर अब राशन भी नहीं है। घर का किराया, छोटे लड़के की स्कूल की फीस, पिता प्रेम बहादुर की दवा इन सब पर खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। घर में खाने की दिक्कत होने लगी है।

नेपाल भेजने के लिए मनी ट्रांसफर वाले भी पैसा नहीं ले रहे हैं। नेपाल जाऊंगा, तो पता नहीं वहां पैसा चलेगा या नहीं। जाने का इंतजाम भी नहीं हो पा रहा है। खेम बहादुर का कहना है कि मकान मालिक ने तो पैसा ले लिया, लेकिन दवा दुकान और स्कूल वाले फीस नहीं ले रहें है। 

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