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Delhi Pollution: एक अप्रैल से धूल और मलबा फैलाने पर होगी कार्रवाई, सीसीटीवी कैमरों से की जाएगी निगरानी

Sun, 29 Mar 2026 03:16 AM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 29 Mar 2026 03:16 AM IST
सार

आयोग ने स्पष्ट किया कि निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और मलबे का गलत तरीके से निपटान अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।

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Delhi Pollution: Action to be taken against the spreading of dust and debris starting April 1.
दिल्ली में वायु प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने निर्माण और तोड़फोड़ (सीएंडडी) गतिविधियों को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल और मलबे का गलत तरीके से निपटान अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे। निर्माण और तोड़फोड़ की गतिविधियां दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के प्रमुख कारणों में से एक हैं। इनसे निकलने वाली धूल हवा में पीएम10 और पीएम2.5 कणों की मात्रा बढ़ा देती है, जिससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है। खासकर सर्दियों के मौसम में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

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सीएक्यूएम के सदस्य-सचिव तरुण कुमार पिथोड़े के अनुसार, नए नियमों के तहत नगर निगम और विकास प्राधिकरणों को अपने-अपने क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था करनी होगी। हर 5 किलोमीटर के दायरे में कम से कम एक कचरा संग्रह केंद्र बनाना अनिवार्य किया गया है, जहां निर्माण और तोड़फोड़ से निकला मलबा जमा किया जाएगा। इसके अलावा, 200 वर्ग मीटर या उससे बड़े प्लॉट पर निर्माण या पुनर्निर्माण शुरू करने से पहले बिल्डरों को यह बताना होगा कि कितनी मात्रा में मलबा निकलेगा। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्माण शुरू करने से पहले सारा मलबा निर्धारित जगह पर जमा कर दिया गया है और उसकी रसीद प्राप्त की गई है।
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मलबे को ढककर ही ले जाया जा सकेगा
नए नियमों के अनुसार, बिना मलबा जमा करने की रसीद के किसी भी परियोजना को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिलेगी। इतना ही नहीं, परियोजना पूरी होने के बाद कंप्लीशन सर्टिफिकेट (सीसी) या ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (ओसी) जारी करने से पहले भी संबंधित एजेंसियां इस रसीद की जांच करेंगी। अधिकारियों ने निर्देश दिया कि निर्माण सामग्री और मलबे को ढककर ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाए।
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एकीकृत वेब पोर्टल भी होगा विकसित
तरुण कुमार पिथोड़े के अनुसार, निगरानी को मजबूत बनाने के लिए एक एकीकृत वेब पोर्टल भी विकसित किया जाएगा। इस पोर्टल पर कचरा संग्रह केंद्रों की जानकारी, उनकी लोकेशन (जियो-टैगिंग) और मलबा ढोने वाले वाहनों की जीपीएस ट्रैकिंग की सुविधा होगी। उन्होंने चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, 2021 के तहत जुर्माना और अन्य दंड भी लगाए जा सकते हैं।

एनसीआर में कचरा संग्रह केंद्रों की कमी
वायु प्रदूषण को कम करने और निर्माण मलबे के बेहतर प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों के बावजूद एनसीआर के कई राज्यों में वेस्ट कलेक्शन पॉइंट्स (डब्ल्यूसीपी) की कमी बनी हुई है। आंकड़ों से पता चला है कि कई क्षेत्रों में तय मानकों के अनुसार कचरा संग्रह केंद्र अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए हैं। निर्देशों के अनुसार, हर 5×5 किलोमीटर के दायरे में कम से कम एक वेस्ट कलेक्शन पॉइंट होना जरूरी है, ताकि निर्माण और तोड़फोड़ से निकलने वाले मलबे को सही तरीके से इकट्ठा और निपटाया जा सके।

राजधानी में पहले से ही 125 वेस्ट कलेक्शन पॉइंट्स मौजूद हैं, जिससे मलबे के प्रबंधन में काफी हद तक मदद मिल रही है। वहीं, हरियाणा के एनसीआर क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक है। यहां 47 वेस्ट कलेक्शन पॉइंट्स की जरूरत है, लेकिन अभी तक केवल 11 ही बनाए गए हैं। यानी बड़ी संख्या में इलाके अब भी इस सुविधा से वंचित हैं। उत्तर प्रदेश के एनसीआर क्षेत्रों में भी पूरी व्यवस्था नहीं हो पाई है। यहां 37 वेस्ट कलेक्शन पॉइंट्स की आवश्यकता है, जबकि अभी 26 ही उपलब्ध हैं। हालांकि, यह स्थिति हरियाणा की तुलना में थोड़ी बेहतर मानी जा रही है। वहीं, राजस्थान के एनसीआर जिलों में भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है। यहां 6 वेस्ट कलेक्शन पॉइंट्स की जरूरत है, लेकिन अभी तक केवल 4 ही बनाए गए हैं।

गड्ढे, कूड़ा और प्रदूषण पर भी नजर रखेंगे कैमरे

राजधानी में सुरक्षा से आगे बढ़कर अब सीसीटीवी नेटवर्क को स्मार्ट सिटी प्रबंधन का बड़ा टूल बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने मौजूदा सिस्टम के अपग्रेड और नई तकनीकों के समावेश के लिए निजी एजेंसी नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रस्तावित योजना के तहत 50 हजार नए कैमरे लगाए जाएंगे, जिनकी मदद से न सिर्फ निगरानी बल्कि सड़कों के गड्ढे, कूड़ा, धूल प्रदूषण जैसी शहरी समस्याओं पर भी नजर रखी जा सकेगी।

लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने मौजूदा नेटवर्क की व्यापक समीक्षा और नई तकनीकों के साथ अपग्रेड प्लान तैयार कराने के लिए निजी एजेंसी नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की है। नई योजना के तहत सीसीटीवी सिस्टम को सिर्फ सुरक्षा तक सीमित रखने के बजाय शहरी प्रबंधन और स्मार्ट मॉनिटरिंग टूल के रूप में विकसित करने की योजना है।

पीडब्ल्यूडी के दस्तावेजों के अनुसार, मौजूदा सीसीटीवी सिस्टम की तकनीकी क्षमता, कमियों, कवरेज गैप और उपयोगिता का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा। इसके आधार पर एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार होगी, जिसमें पूरे सिस्टम के अपग्रेड की रूपरेखा तय की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, मौजूदा नेटवर्क कई मामलों में तकनीकी रूप से पुराना हो चुका है। स्टोरेज, नेटवर्क कनेक्टिविटी, डेटा प्रोसेसिंग और निगरानी क्षमता जैसी चुनौतियों को देखते हुए इसे आधुनिक तकनीक से लैस करने की जरूरत है।

यही वजह है कि नई योजना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित फीचर्स को शामिल किया जा रहा है। इसमें फेस रिकग्निशन, ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (एएनपीआर) और भीड़ या संदिग्ध गतिविधियों की पहचान जैसे एडवांस टूल शामिल होंगे। इसकी खासियत यह है कि सीसीटीवी का इस्तेमाल अब केवल अपराध रोकथाम तक सीमित नहीं रहेगा। कैमरों के जरिये सड़कों पर गड्ढों की पहचान जैसे कार्य होने से नगर निगम और पीडब्ल्यूडी को मेंटेनेंस कार्यों की निगरानी में मदद मिलेगी और शिकायतों के समाधान में तेजी आ सकती है।

एक प्लेटफॉर्म पर हो सकेगी लाइव मॉनिटरिंग
योजना के तहत दिल्ली में 50 हजार नए सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने पहले पूरे शहर में विस्तृत सर्वे कराया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसे स्थानों की पहचान करना है जहां निगरानी की जरूरत अधिक है। पूरे सिस्टम को एकीकृत करने के लिए एक अत्याधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर विकसित करने की योजना भी है। इसके जरिये दिल्ली पुलिस, पीडब्ल्यूडी और अन्य संबंधित एजेंसियां एक ही प्लेटफॉर्म पर लाइव मॉनिटरिंग कर सकेंगी। नई योजना में साइबर सिक्योरिटी को भी अहम प्राथमिकता दी गई है।

मौजूदा सिस्टम में ये बड़ी कमियां सामने आईं
दस्तावेज में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि दिल्ली में लगे मौजूदा सीसीटीवी नेटवर्क में कई तकनीकी और ऑपरेशनल कमियां मौजूद हैं। इनमें कई जगहों पर निगरानी का दायरा सीमित है, यानी कैमरों के बावजूद कई इलाके प्रभावी कवरेज से बाहर हैं। नेटवर्क कनेक्टिविटी, डाटा स्टोरेज, साइबर सुरक्षा और सिस्टम इंटीग्रेशन से जुड़ी चुनौतियां भी चिन्हित की गई हैं। इन कमियों को देखते हुए अब पूरे सीसीटीवी नेटवर्क का विस्तृत आकलन और अपग्रेड प्लान तैयार किया जा रहा है। राजधानी में 2018 से अब तक दो चरणों में करीब 2.8 लाख कैमरे लगाए गए। इनमें से पहले चरण में लगाए गए अधिकांश कैमरे चीनी कंपनियों के हैं और सिम-आधारित तकनीक पर काम करते हैं। विशेषज्ञों ने इन कैमरों के जरिये डेटा लीक होने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर संभावित खतरे की आशंका जताई थी।

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