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महिला दिवस पर खास : मां...दीदी तो कई ने दिया है देवी का दर्जा

Sat, 06 Mar 2021 05:29 AM IST
दुष्यंत शर्मा राजीव कुमार, नई दिल्ली
राजीव कुमार, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 06 Mar 2021 05:29 AM IST
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Delhi news: special story on womens day
सिपाही सुकन्या... - फोटो : amar ujala

सुकन्या, सीमा और मुकेशी, यह किसी के लिए मां हैं तो किसी के लिए दीदी। कुछ ने तो इनको देवी तक का दर्जा दे रखा है। हो भी क्यों न, परिवार से बिछड़े छोटे छोटे बच्चों को जो इनने उनके पापा-मम्मी से मिला दिया है। घर जाने के बाद भी बच्चे इनको भुला नहीं सके हैं। 

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अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बात दिल्ली पुलिस की तीन सेनानियों की है, जिन्होंने भूले बिसरे बच्चों को उनके परिवार तक पहुंचाने में मदद की है। इसके लिए तीनों ने नौकरी से बाहर जाते हुए निजी दिलचस्पी दिखाई है। इसके बदौलत करीब चार सौ से ज्यादा बच्चों को घर का रास्ता दिखाया है। 
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सुकन्या: 360 परिवारों की लौटाई खुशियां
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच में तैनात सिपाही सुकन्या में एक गजब जुनून है। दिल्ली से किसी भी परिवार के गायब हुए बच्चों की जानकारी मिलते ही वह सक्रिय हो जाती हैं और तब तक उन्हें सकून नहीं मिलता जब तक कि बच्चा अपने परिवार तक नहीं पहुंच जाता। बच्चों की तलाशने में वह दिन और रात की चिंता नहीं करती हैं। सुकन्या बताती है कि गायब हुए बच्चों को तलाशना इतना आसान नहीं है। लेकिन आला अधिकारियों की देखरेख में इस काम को आसान कर देती है। सुराग-दर-सुराग को तलाशते हुए उनतक पहुंच जाती है।
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इसका परिणाम यह है कि आज वह दिल्ली के करीब 360 परिवारों को उनकी खुशियां लौटा चुकी हैं। जिन माता-पिता को उनका लाडला मिला है वह परिवार उन्हें देवी तक मान चुके हैं। दिल्ली पुलिस के अधिकारी जहां इनके काम की तारीफ कर इनका हौसला अफजाई करते हैं वहीं परिवार भी पूरी तौर पर इनके काम में सहयोग देते हैं। सुकन्या बताती हैं कि बच्चों की तलाश के दौरान उनसे वह भावनात्मक रूप से जुड़ गई है, जिनके परिवार वाले अकसर मिलते जुलते रहते हैं। 

मुकेशी: कलेजे का टुकड़ा पाने पर परिवार देता है दुआ

Delhi news: special story on womens day
मुकेशी - फोटो : amar ujala

दिल्ली मेट्रो में तैनात सिपाही मुकेशी बताती हैं कि उनके लिए सकुन का पल तब होता है जब वह किसी परिवार के दिल के टूकड़े को उनसे मिलवाती है। परिवार उन्हें दिल से दुआ देता है। आमतौर पर परिवार से बिछड़े बच्चों को ढूंढने का कार्य आसान नहीं होता। खासतौर पर ऐसे बच्चे जिनका लोकेशन की सटीक जानकारी नहीं हो, ऐसे बच्चे को ढूंढना भूसे की ढेर में सुई तलाशने जैसा होता है। लेकिन पीड़ित परिवार के भरोसे और पुलिस अधिकारियों की सहयोग से कार्य आसान हो जाता है।

मुकेशी बताती है कि उसकी बेटी जब एक साल की हुई तब से उसे दौरे पड़ते हैं। अपने बच्चे का दुखदर्द ही उनके लिए प्रेरणा का काम किया और वह अब कई परिवारों से दुआ ले रही हैं। मुकेशी बताती है कि इस काम के लिए उनके पति और परिवार की सदस्य प्रेरित करते हैं और उसके बाद वह इसके लिए दिन रात एक कर देती है। इस वर्ष जनवरी माह से उन्होंने 16 बच्चों को उनके परिवार को सौंप चुकी है। 
 

सीमा: बच्चों को तलाशने के बाद मिलती है खुशी

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हवलदार सीमा - फोटो : amar ujala
मेट्रो पुलिस में तैनात हवलदार सीमा बताती हैं कि एक परिवार का बच्चा जब बिछड़ जाता है तो परिवार पूरी तरह से टूट जाता है। ऐसे में वह यह अपेक्षा करता है कि कोई करिश्मा हो और उसका बच्चा वापस मिल जाए। हम मिशन समझकर बच्चे की तलाश करते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। बच्चे के मिलने पर जैसी खुशी परिवार वालों को होती है, वैसी खुशी उन्हें भी मिलती है। परिवार उन्हें इस सच्चे काम के लिए आर्शीवाद देता है।

सीमा बताती है कि इस अभियान में वरिष्ठ अधिकारियों का पूरा सहयोग रहता है, जिसकी बदौलत वह अब तक 53 बच्चों को उनके परिवार से मिलवा चुकी है। बच्चों को तलाशने में अनुमान और एक साक्ष्य से दूसरे साक्ष्य का मिलाना काफी महत्वपूर्ण होता है तभी बिछड़े बच्चों तक पहुंच पाना संभव है। इस काम में परिवार वाले भी उन्हें पूरा सहयोग करते हैं।
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