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Delhi: हाईकोर्ट की एकल पीठ का आदेश- सेवा नहीं तो संपत्ति भी नहीं, बेटे को 7 करोड़ रुपये करने होंगे वापस
Fri, 10 Jul 2026 03:13 AM IST
दुष्यंत शर्मा
गौरव बाजपेई, नई दिल्ली
गौरव बाजपेई, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 10 Jul 2026 03:13 AM IST
सार
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने कहा कि संपत्ति या धन वापसी से संबंधित विवादों में क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया का सख्ती से पालन जरूरी है।
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दिल्ली हाईकोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत पिता द्वारा बेटे को दिए गए 7.15 करोड़ रुपये लौटाने के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने कहा कि संपत्ति या धन वापसी से संबंधित विवादों में क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया का सख्ती से पालन जरूरी है।
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मामला प्रदीप कुमार मित्तल (बेटा) बनाम जिला मजिस्ट्रेट, साउथ ईस्ट दिल्ली का है। अदालत ने बेटे को पिता द्वारा दिए गए रुपये लौटाने के वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए कई टिप्पणियां की हैं। मामले में पिता राजेंद्र कुमार मित्तल ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत आवेदन दायर कर बेटे से 7.15 करोड़ रुपये वापस मांगे थे, जो उन्होंने संपत्ति बेचकर बेटे को ट्रांसफर किए थे। पिता का आरोप था कि बेटे ने देखभाल का वादा किया था लेकिन उसका पालन नहीं किया।
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अदालत ने पाया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की धारा 4 से 9 और दिल्ली नियमावली 2009 के नियम 22(3) के तहत संपत्ति वापसी या बेदखली के मामलों में अलग प्रक्रिया है। ऐसे मामलों में डिप्टी कमिश्नर/जिला मजिस्ट्रेट ही प्रथम प्राधिकारी है, जबकि अपील डिवीजनल कमिश्नर के पास जाती है। न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि रखरखाव और संपत्ति वापसी के मामले अलग-अलग हैं। रखरखाव के लिए एडीएम/एसडीएम प्राधिकारी है लेकिन संपत्ति से जुड़े मामले में डिप्टी कमिश्नर/जिला मजिस्ट्रेट ही सक्षम हैं।
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82 वर्षीय पिता को हाईकोर्ट के आदेश से मिला मरहम
82 वर्षीय राजेंद्र कुमार मित्तल आज भी उस पल को याद करते हैं, जब उन्होंने अपनी सारी जायदाद बेचकर जमा की गई 7.15 करोड़ रुपये की राशि अपने छोटे बेटे प्रदीप कुमार मित्तल को सौंप दी थी। बेटे ने वादा किया था कि वह माता-पिता की पूरी जिंदगी देखभाल करेगा लेकिन कुछ वर्ष बाद ही पिता को एहसास हुआ कि उनका भरोसा धोखा बन गया। आज वे इस उम्र में अकेलेपन, आर्थिक अनिश्चितता और भावनात्मक पीड़ा से जूझ रहे हैं।
राजेंद्र कुमार मित्तल और उनकी पत्नी दोनों वरिष्ठ नागरिक हैं। उन्होंने सुखदेव विहार, दिल्ली में अपना मकान बनवाया था। उसे बेचकर मिले कुल 10.53 करोड़ रुपये में से 7.15 करोड़ रुपये 27 जनवरी 2017 को दो चेक के जरिए छोटे बेटे प्रदीप को ट्रांसफर कर दिए थे। बड़े बेटे ऋषि कुमार मित्तल इस विवाद में पक्षकार नहीं हैं। पिता का कहना है कि यह राशि शर्त के साथ दी गई थी कि बेटा उनकी देखभाल करेगा लेकिन जब बेटे ने वादा तोड़ दिया, तो मजबूरन कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा। राजेंद्र कुमार मित्तल फरीदाबाद के ग्रीन फील्ड कॉलोनी में रहते हैं। उन्होंने मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007 के तहत याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने न केवल मासिक भरण-पोषण बल्कि दी गई राशि वापस करने की मांग की।
ता की याचिका पर एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल) ने 31 मार्च 2022 को प्रदीप को 7.15 करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया। इसके बाद अपील हुई, जिसमें कुछ राहत मिली लेकिन मूल मुद्दा लंबित रहा। हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी मामला चला। अंततः न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने 6 जुलाई 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।