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पूर्वांचली मतदाताओं की लामबंदी की ओर उन्मुख हुई दिल्ली की राजनीति

Tue, 14 Jan 2020 01:49 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Tue, 14 Jan 2020 01:49 PM IST
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delhi election 2020 to cater purvanchali voters all parties doing their best
आप कांग्रेस बीजेपी - फोटो : सोशल मीडिया

दिल्ली विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही सभी राजनीतिक पार्टियों में पूर्वांचली वोटरों को अपने पाले में खींचने की होड़ लग गई है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि सभी पार्टियां अच्छी संख्या में पूर्वांचलियों को अपनी पार्टी का टिकट देंगी।

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निर्विवाद रूप से सभी राजनितिक पंडित मानते हैं कि पूर्वांचली समाज जिस पार्टी के साथ जुड़ जाता है वो पार्टी सत्ता की ओर मुड़ जाती है। बहुत सारी सीटों पर तो पूर्वांचली समुदाय की संख्या निर्णायक भूमिका अदा करती है।
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दिल्ली में छठ पर्व की बढ़ती लोकप्रियता एवं सभी दलों के नेताओं का बढ़-चढ़ कर इससे जुड़ना इस बात का प्रमाण है कि अधिकांश विधानसभा सीटों पर पूर्वांचली समुदाय के वोटर्स की अच्छी-खासी तादाद है। वर्तमान में सत्ताधारी दल आम आदमी पार्टी के 13 विधायक इसी समाज से हैं।
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इस समाज की महत्ता को ऐसे देखा जा सकता है कि दिल्ली की राजनीति के दो महत्वपूर्ण दल आम आदमी पार्टी और बीजेपी दोनों के प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचली समाज से ताल्लुक रखते हैं। इसके बावजूद इन दलों ने पूर्वांचली वोटरों को साधने के लिए पूर्वांचली समाज के नये लोगों को आगे करने का निर्णय लिया है।

अब यह स्थापित तथ्य हो चुका है कि दिल्ली की राजनीति में पूर्वांचली वोटर्स की निर्णायक भूमिका है। अगर हम अतीत में देखें तो स्वर्गीय शीला दीक्षित, महाबल मिश्र, लाल बिहारी तिवारी सहित कई दिग्गज नेता पूर्वांचल समुदाय का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। 

दिल्ली की विभिन्न विधानसभा सीटों पर पूर्वांचली समुदाय के दबदबे का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके लिए ही जहां कांग्रेस ने बिहार से ताल्लुक रखने वाले कीर्ति आज़ाद के नेतृत्व में कीर्ति सेना का गठन किया है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने भी पूर्वांचल से ताल्लुक रखने वाले संजय सिंह को पार्टी के पूर्वांचली चेहरे के तौर पर आगे किया है।

गौरतलब है कि संजय सिंह ने पिछले दिनों नजफगढ़ जिले के गोमती गार्डन में मकर संक्रांति महोत्सव के आयोजन के अवसर पर पूर्वांचल समुदाय के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोकर एक बेहद सशक्त सन्देश दिया है। इससे उनका पूर्वांचल समुदाय पर दबदबे का दावा और भी मज़बूत हो गया है। दूसरे नजरिए से देखें तो पार्टी ने संजय सिंह की लोकप्रियता को भुनाने की भरपूर कोशिश की है।

विकास नगर के गोमती गार्डन में आयोजित इस कार्यक्रम को भाजपा के पदाधिकारियों ने भले ही एक गैर राजनीतिक आयोजन के रूप पेश किया हो लेकिन भाजपा के पदाधिकारियों (प्रदेश उपाध्यक्ष सतेन्द्र सिंह, पूर्व निगम पार्षद विजय सोलंकी, निगम पार्षद विजय गौर, पूर्व निगम पार्षद करमवीर शेखर, सुनील जिंदल अमिता रश्मि) और नजफगढ़ ज़िले के भारतीय जनता पार्टी के छह मंडलों के अध्यक्षों (राधेश्याम चौहान, बबलू पंडित, अमरेन्द्र सिंह, रवि बत्रा, रविंदर फोगाट, गौरीशंकर भारद्वाज) बड़े भाजपा नेता शामिल हुए। इसकी पुष्टि करने के लिए अपने आप में पर्याप्त है कि इस आयोजन के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अंदरखाने पूरे रणनीतिक अंदाज़ में काम किया है।

बीजेपी भी ने पूर्वी दिल्ली में जहां अभय वर्मा (पार्टी उपाध्यक्ष, पूर्व अध्यक्ष बार एसोसिएशन) विपिन बिहारी सिंह (पूर्व मेयर) पूर्वांचली चेहरा होने की वजह से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं और इन्हें कहीं न कहीं पार्टी महत्व भी दे रही है। 

वहीं दूसरी तरफ पश्चिमी दिल्ली में संजय सिंह के दबदबे और लोकप्रिय व्यक्तित्व को देखते हुए बीजेपी का यह रणनीतिक कदम काफी दूरगामी माना जा रहा है। अगर परसेंटेज के लिहाज से देखा जाय तो विकासपुरी विधानसभा में सबसे ज्यादा तादाद (48 फीसदी) में पूर्वांचली वोटरों की है। इतना ही नहीं इसके आसपास की सीटों पर भी पूर्वांचली वोटर भी निर्णायक स्थिति में हैं। इसमें द्वारका विधानसभा में 35 फीसदी, मटियाला विधानसभा में 34 फीसदी, उत्तमनगर विधानसभा में 28 फीसदी, नजफगढ़ विधानसभा में 23 फीसदी और नांगलोई में 33 फीसदी पूर्वांचली मतदाताओं की आबादी है।

पूर्वांचलियों के इसी दबदबे को देखते हुए आम आदमी पार्टी के दिग्गज नेता महाबल मिश्र के बेटे विनय मिश्र विगत दिवस पार्टी में शामिल कराया गया है। आम आदमी पार्टी के दोबारा सत्ता में आने की राह पूर्वांचलियों के दरवाजे से ही होकर जाती है। इससे दिल्ली की सत्ता में पूर्वांचल के वोटरों की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। कांग्रेस ने पूर्वांचलियों को नज़रअंदाज करने का एक कदम उठाया था उसी के परिणामस्वरूप  दिल्ली में उनका जनाधार खिसकने को माना गया।

दिल्ली की राजनीति में अवैध कालोनियों को नियमित किए जाने के विषय को भी विभिन्न पार्टियों द्वारा प्रमुखता दिया जाना, पूर्वांचलियों का समर्थन हासिल करने के प्रयास के तौर पर ही देखा जा सकता है। जहां एक तरफ बीजेपी के चुनावी अभियान की शुरुआत 40 लाख लोगों को उनके घरों के मालिकाना हक को केंद्र बिंदु में रखते हुए की गई थी। वहीं केजरीवाल ने दिल्ली में कच्ची कॉलोनियों में सीवर, पानी बिजली और सड़क देने का दावा करके “कच्ची कॉलोनियों में खूब किया विकास” उभारने की बात कहकर की थी जिसके विज्ञापन पूरी दिल्ली में दोनों दलों ने मजबूती से किया।

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