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दिल्ली के सभी नगर निगम इस काम को करने में हुए फेल, कूड़ा हुए करोड़ों रुपए

Mon, 03 Dec 2018 10:26 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 03 Dec 2018 10:26 AM IST
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delhi corporations crores of money goes waste as they fail to crack colour code of dustbins
सांकेतिक तस्वीर
दिल्ली भले ही देश की राजधानी हो लेकिन यहां कूड़ा पृथक्कीकरण(गीला-सूखा कूड़ा अलग करना) की बात कल्पना से परे ही लगती है और इसका कारण पैसों की कमी नहीं है। इसके लिए लोगों में जागरूकता और अधिकारियों द्वारा नियम पालन न करवा सकने को हम जिम्मेदार मान सकते हैं क्योंकि राजधानी में लाखों कचरे के डिब्बे बिना इस्तेमाल किए ही पड़े हैं। कुछ तो चोरी भी हो गए हैं।
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इस तरह का एक वाकया हाल ही में तब सामने आया जब दक्षिण दिल्ली के अफ्रीका एवेन्यू में नीले और हरे कूड़े के डिब्बे तोड़ दिए गए। तीनों नगर निगमों द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि अलग-अलग माप के लाखों कूड़े के डिब्बे शहर के विभिन्न हिस्सों में बांटे और लगाए गए हैं।
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उत्तरी निगम ने 12000 कूड़े के डिब्बे लगाने के लिए 9 करोड़ रुपए खर्च किए। इनकी क्षमता 100 लीटर(यह क्षमता एक सेट की यानी हरा और नीला दोनों मिलाकर) है। दुकानदारों को भी 12 लीटर वाले 4 लाख डिब्बे दिए गए।
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इसी तरह पूर्वी निगम ने भी 43000 छोटे कूड़े के डिब्बे बांटे और 1 लाख और बांटने वाली है। यही नहीं पूर्वी दिल्ली में 4950 डिब्बे 100 लीटर क्षमता वाले भी लगाए गए हैं। इसमें कुल खर्च 1.6 करोड़ हुआ। दक्षिण निगम ने भी 7.7 करोड़ खर्च कर 100 लीटर वाले 13836 डिब्बे लगवाए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी काम के लिए लोगों की सहभागिता बहुत जरूरी है। सिर्फ डिब्बे लगाकर ये सोच लेना कि सब हो जाएगा कोई सकारात्मक बदलाव नहीं लाएगा। अलग-अलग रंगों के डिब्बे लगाकर सोचा गया था कि कूड़े को भी अलग किया जा सकेगा लेकिन अब तक जो नतीजा सामने आया है वह बहुत अच्छा नहीं रहा है।

जहां हरे डिब्बे का मतलब होता है कि उसमें गीला कचरा पडे़गा यानी वो जो ऑर्गेनिक हो और उसे कंपोस्ट किया जा सके। वहीं नीले डिब्बे का मतलब है सूखा कूड़ा जिसे रिसाइकिल किया जा सके। गीले कूड़े में रसोई से निकलने वाला कूड़ा, मछलियों की हड्डियां या पेड़ों की पत्तियां, झाड़ियां या लकड़ियां होती हैं।


सूखे कूड़े में प्लास्टिक बॉटल, कप, न्यूजपेपर, पिज्जा बॉक्स और ऐसी ही अन्य चीजें। घरों से निकलने वाला 60-70 प्रतिशत कूड़ा रसोई या पेड़ पौधों से निलकने वाले कूड़े के रूप में होता है। इसके अलावा  सूखा प्लास्टिक, डिब्बे, रैपिंग के रूप में निकलते हैं।
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