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गुरु हत्या के बाद डीपी यादव के सितारे गर्दिश में

Wed, 11 Mar 2015 01:27 AM IST
शादाब रिज़वी/अमर उजाला, बुलंदशहर
शादाब रिज़वी/अमर उजाला, बुलंदशहर Updated Wed, 11 Mar 2015 01:27 AM IST
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After the murder of master DP Yadav stars circle.

अपने राजनीतिक गुरु महेंद्र भाटी की हत्या के बाद से बाहुबली नेता डीपी यादव के सितारे गर्दिश में हैं। उसी डीपी को बुलंदशहर ने सियासत और सामाजिक तौर पर बेहद बुलंदी दी। यानी वो सियासत में अर्श तक पहुंचा।

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उसने तीन बार सदर सीट से विधानसभा में नुमाइंदगी की और एक बार सूबे के वजीर (मंत्री) भी रहा।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का करीबी रहा और राजनीतिक क, ख, ग उनके सानिध्य में सीखकर सियासी सफर पर दौड़ लगाने वाले पूर्व विधायक को बदनामी के कई दाग भी इसी जिले से मिले।
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उसने यहां शराब का बड़ा कारोबार चलाया और कोठी भी बनाई। यहीं से सिनेमा जगत में इंट्री भी की है।

मुलायम सिंह के करीबी होने के तोहफे के तौर पर उसे 1989 में बुलंदशहर सदर सीट से विधानसभा चुनाव में जनता दल की ओर से टिकट मिला। डीपी जनता दल के टिकट पर विधायक चुना गया।
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पहली बार में ही सूबे में पंचायत राज मंत्री का ओहदा भी हासिल कर लिया था। 1991 के विधानसभा चुनाव में डीपी यादव को समाजवादी जनता पार्टी से जीत मिली।

इस चुनाव में जीत की पटकथा डीपी यादव ने जेल से लिखी थी। वह जेल में रहते विजयी रहा। 1993 के चुनाव में डीपी को जनता ने फिर सिर आंखों पर बैठाया और सपा के टिकट पर विधायक बना।

तीन अलग-अलग बैनरों के नीचे विधायकी का चुनाव जीतकर डीपी यादव ने यह संदेश दिया कि बुलंदशहर की सियासत में उसका कोई सानी नहीं है।

रावण के ननिहाल से रखा सियासत में कदम
रावण की ननिहाल गौतमबुद्धनगर केे गांव बिसरख में थी। डीपी ने पहली बार बिसरख से ब्लाक प्रमुख का चुनाव जीता। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बुलंदशहर में रहकर यूपी में शराब के कारोबार पर एकछत्र राज भी किया। बता दें कि रथयात्रा के दौरान डीपी यादव मुलायम सिंह के करीब आए। इसी बीच गर्दिश का समय शुरू हुआ।


सपा से अलग हुए तो खुद की सियासी पार्टी बना ली। हाल के लोकसभा चुनाव में डीपी यादव सपा में आजम खां के जरिए शामिल होना चाहते थे, लेकिन अखिलेश यादव की जिद्द के आगे इंट्री नहीं मिल पाई।

भाजपा के मंच पर डीपी यादव दिखे। हंगामा हुआ तो भाजपा बैकफुट पर आ गई।

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