बच्चों के आंख और कान के लिए खतरनाक हैं लगातार ऑनलाइन क्लास, कमजोर हो रहा स्वास्थ्य
कोरोना काल से पहले जहां स्कूल प्रबंधन बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की नसीहत दे रहा था। वहीं अब बच्चों को ऑनलाइन क्लॉस के जरिए शिक्षित कर रहा है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन ने अभिभावकों की जेब खाली करने का ये नया ढकोसला अपनाया है।
इससे न केवल अभिभावकों की जेब पर नए मोबाइल, इंटरनेट का बोझ पड़ रहा है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखें कमजोर होने के साथ-साथ मोबाइल की रेडिएशन से स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा है।
स्कूल प्रबंधन भी ये मानता है कि छोटे बच्चों को मोबाइल देना गलत है। ऑनलाइन क्लॉस में सही तरीके से पढ़ाई नहीं हो पाती है। ऐसे में बच्चों के लिए ये बेईमानी साबित हो रहा है।
10वीं से 12वीं कक्षा तक के लिए ही ऑनलाइन क्लॉस का प्रावधान होना चाहिए। मंत्रालय ने यह जो समय फिक्स किया है 10-12वीं के लिए ठीक है। छोटे बच्चों की ऑनलाइन क्लॉसेज को बंद कर देना चाहिए।
30 से 45 मिनट अधिकतम समय सीमा तय
मानव संसाधन मंत्रालय के द्वारा जारी गाइडलाइन के तहत प्री-प्राइमरी के बच्चों के लिए रोजाना 30 मिनट और एक से 12वीं तक के बच्चों के लिए 30 से 45 मिनट के अधिकतम चार सत्रों की समय सीमा निर्धारित की गई है। स्कूलों को इन निर्देशों के आधार पर ही पढ़ाई करानी होगी।
एक अभिभावक जसविंदर कौर ने बताया कि छोटे बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लॉस होनी ही नहीं चाहिए। बच्चों के अभिभावकों को सिलेबस देना चाहिए और इसे पूरा कराने की जिम्मेदारी भी उनको सौंपी जानी चाहिए। इससे बच्चों को फोन से दूर रखा जा सकता है।
एक अन्य अभिभावक आलोक का कहना है कि मेरे दो बच्चे 10वीं और 12वीं कक्षा में हैं। बड़े बच्चों के लिए 30 से 45 मिनट का जो समय तय किया गया है। वह काफी कम है। अगर एक साथ 40 बच्चे क्लास ले रहे हैं तो इतने समय में बच्चे केवल अपने प्रश्न ही कर सकते हैं। पढ़ाई का उन्हें कम समय मिलेगा।
वहीं महिला सेल अभिभावक एकता मंच की सदस्य नूतन शर्मा का कहना है कि पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लॉसेज होनी ही नहीं चाहिए। यह केवल दिखावा है, जिससे स्कूल अभिभावकों से फीस वसूल सके।
अभिभावक एकता मंच की प्रधान कैलाश शर्मा ने कहा कि ऑनलाइन क्लासेज को लेकर सरकार ने कोई प्रावधान नहीं बनाया। अगर कोई छात्र मोबाइल या इंटरनेट की सुविधा नहीं होने के कारण ऑनलाइन क्लास नहीं ले पा रहा है तो क्या उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया जाएगा। ये बड़े स्कूलों के लिए पैसे वसूलने के ढकोसले मात्र हैं।
एनआइटी-3 स्थित राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य रविंदर मनचंदा का कहना है कि बच्चे चार माह से तनाव में हैं। मोबाइल फोन पर पढ़ने से उनकी आंखें कमजोर हो रही हैं। स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है। नई गाइडलाइन सभी को फॉलो करनी चाहिए। हम भी फॉलो करेंगे।
क्या कहते हैं डॉक्टर
एशियन अस्पताल के ईएनटी विभाग के निदेशक डॉ. ललित मोहन पराशर कहते हैं कि अगर बच्चे स्पीकर पर फोन या कंप्यूटर क्लास लेते हैं तो कोई असर नहीं पड़ता। इसके विपरीत अगर कानों में लीड लगाकर क्लास लेते हैं तो उनके सुनने की क्षमता कम हो सकती है। ज्यादा तेज आवाज लगातार कान में गूंजने से कान के पर्दे कमजोर होने लगते हैं।
क्यूआरजी हेल्थ सिटी अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल सेठ का कहना है कि मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी आंखों के लिए नुकसानदायक होती है जैसे नजर का कम होना, दूर का धुंधला दिखाई देना और पास का भी धुंधला दिखाई देना और आंखों में से पानी आना आदि रोशनी कम होने की वजह है।