बचपन में ही दिल की सेहत पर खतरा क्यों?: कहीं आपका बच्चा तो नहीं करता ये दो गलती, आप भी हैं बराबर के जिम्मेदार
बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आरती सिन्हा बताती हैं कि एक से तीन साल के टॉडलर और तीन से पांच साल के प्री-स्कूलर बच्चों में हार्ट अटैक का खतरा सामान्य तौर पर बेहद कम होता है। इस उम्र में जीवनशैली की गड़बड़ी के कारण हार्ट अटैक होना बहुत दुर्लभ है।
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बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन की जगह पिज्जा-बर्गर और हाथों में खिलौनों की जगह मोबाइल ने ले ली है। बदलती जीवनशैली की यह तस्वीर अब बच्चों के दिल की सेहत पर भारी पड़ सकती है। घंटों मोबाइल की स्क्रीन से चिपके रहना, मैदान में खेलने से दूरी और जंक फूड का बढ़ता शौक बच्चों को कम उम्र में ही मोटापे और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की ओर धकेल रहा है। चिंता की बात यह है कि इन आदतों का असर केवल आज की सेहत पर नहीं, बल्कि भविष्य में दिल की बीमारियों के खतरे पर भी पड़ सकता है। डॉक्टरों ने माता-पिता को आगाह करते हुए बच्चों की थाली और दिनचर्या दोनों बदलने की सलाह दी है।
मोटापा, ब्लड प्रेशर और फिर दिल से जुड़ी बीमारियां
कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. रवि प्रकाश के अनुसार, आमतौर पर हार्ट अटैक को खराब जीवनशैली से जोड़कर देखा जाता है। बच्चों में खेलकूद और दौड़भाग के कारण शारीरिक निष्क्रियता का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन उनके खानपान में गड़बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने बताया कि जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ खाने से बच्चों में मोटापा बढ़ सकता है। मोटापे के कारण हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी हो सकती है, जो आगे चलकर दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ाती है।
छोटे बच्चों में हार्ट अटैक के मामले बेहद दुर्लभ
बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आरती सिन्हा बताती हैं कि एक से तीन साल के टॉडलर और तीन से पांच साल के प्री-स्कूलर बच्चों में हार्ट अटैक का खतरा सामान्य तौर पर बेहद कम होता है। इस उम्र में जीवनशैली की गड़बड़ी के कारण हार्ट अटैक होना बहुत दुर्लभ है। हालांकि, कुछ बच्चों में जन्मजात हृदय रोग, दिल की बनावट में खराबी, आनुवंशिक बीमारियां और कावासाकी रोग जैसी समस्याओं के कारण दिल से जुड़ी गंभीर परेशानियां हो सकती हैं।
मोबाइल और टीवी के सामने बीत रहा बच्चों का ज्यादा समय
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम भी दिल की सेहत के लिए चिंता का विषय है। मोबाइल, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर ज्यादा समय बिताने से बच्चों का खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों का समय कम हो रहा है। इसका असर वजन पर पड़ता है और मोटापे का खतरा बढ़ता है। इसके साथ ही शरीर में सूजन और आगे चलकर दिल से जुड़ी बीमारियों की आशंका भी बढ़ सकती है।