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गूंजेगी किलकारियां: दिल्ली में पैदा हुए एक माह तक के बच्चों की होगी जांच, 31 अस्पतालों में चलेगा अभियान

Sat, 04 Mar 2023 04:08 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Sat, 04 Mar 2023 04:08 PM IST
सार

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. रवि मेहर ने बताया कि यदि नवजात में सुनने की क्षमता लौट जाती है तो वह बोलना भी शुरू कर सकता है।

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Children born in Delhi up to one month will be examined implanted after surgery ability to speak will return w
राजधानी में पैदा होने वाले बच्चे अब मूक-बधिर नहीं रहेंगे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी में पैदा होने वाले बच्चे अब मूक-बधिर नहीं रहेंगे। सामान्य बच्चों की तरह बोलना और सुनना संभव होगा। इससे वह किलकारियां भी भरेंगे और हाव-भाव से संवेदनाएं भी जाहिर होती रहेंगी। स्वास्थ्य विभाग ने इस तरह के दिव्यांग बच्चों की पहचान करने का फैसला लिया है। शुक्रवार से दिल्ली के सभी 31 सरकारी अस्पतालों में एक माह तक के सभी नवजात की जांच शुरू हो चुकी है। 

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सरकारी अस्पताल में पैदा हुए इन नवजात की जांच में देखा जाएगा कि बच्चों के कानों तक आने वाली तरंग उनके मस्तिष्क तक जाती है या नहीं। यदि बच्चों में यह तरंग का कोई प्रभाव नहीं होता तो उक्त नवजात में ऑपरेशन से इंप्लांट बच्चे के कान में प्रत्यारोपित किए जाएंगे जिसकी मदद से बच्चा 100 प्रतिशत तक सुन सकेगा। साथ ही, बोलने की क्षमता भी विकसित हो जाएगी। 

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मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में कान, नाक और गला विभाग के प्रोफेसर निदेशक डॉ. रवि मेहर के मुताबिक, एक हजार नवजात में से तीन से पांच बच्चों में सुनने की क्षमता नहीं होती। इन बच्चों को ठीक किया जा सकता है। लोकनायक अस्पताल में बीते एक साल में ऐसे नौ नवजात में इंप्लांट किया गया है जो अब सुनने लगे हैं। अब पूरी दिल्ली में अभियान चलाकर ऐसे बच्चों का उपचार किया जाएगा। डॉक्टरों कि कोशिश है कि दिल्ली में आने वाले दिनों में कोई नवजात मूक-बधिर न रहें।

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1000 में से पांच बच्चे पीड़ित
जन्म के दौरान एक हजार में से तीन से पांच बच्चों में सुनने व बोलने की क्षमता नहीं होती। डॉक्टरों की माने तो हर साल दिल्ली में एक से दो लाख तक बच्चों का जन्म होता है। इसमें बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे होते हैं जो सुन या बोल नहीं पाते। अब ऐसे बच्चों की पहचान जन्म के एक माह में ही कर ली जाएगी। साथ ही, समय पर उनका उपचार कर लिया जाएगा, जिससे बच्चों में यह दिव्यांगता पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।

31 अस्पतालों में चलेगा अभियान
नवजात प्रारंभिक मूल्यांकन विजन (एनईईवी) अभियान की प्रोजेक्ट इंचार्ज व बाल चिकित्सा विभाग में निदेशक प्रोफेसर डॉ. सीमा कपूर के नेतृत्व में शुक्रवार से दिल्ली के 31 अस्पतालों में नवजात बच्चों की जांच होगी। इसमें बच्चों की ओटो कास्टिक एमिशंस (ओएई) और ब्रेन इवोक्ड रिस्पॉन्स ऑडिटरी (बीईआरए) टेस्ट होंगे। ओएई जांच के लिए सभी अस्पतालों में मशीनें आ गई हैं। साथ ही, इसका प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। जांच से पता चल जाएगा कि नवजात बोल और सुन सकता है या नहीं। यदि नवजात पीड़ित पाया जाता है तो सर्जरी कर इंप्लांट लगाया जाएगा जिसकी मदद से बच्चा सामान्य बच्चे की तरह सुन सकेगा। रिसर्च बताते हैं कि यह सर्जरी 100 फीसदी तक कारगर है।

सुनने के साथ लौटती है बोलने की क्षमता
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. रवि मेहर ने बताया कि यदि नवजात में सुनने की क्षमता लौट जाती है तो वह बोलना भी शुरू कर सकता है। दरअसल, बोलने का सीधा संबंध सुनने से हैं। जब हम किसी भी ध्वनि को सुनने हैं तो वह हमारे दिमाग में तरंग बनाता है जो हमारे बोलने की ग्रंथियों को जागृत करता है।

इन महिलाओं के बच्चों में आती है समस्या
- अनुवांशिक रोग (50 प्रतिशत मामलों में )
- गर्भवती महिला को इन्फेक्शन होने से
- महिलाओं में अन्य रोग

इन बच्चों में होती है समस्या
- जन्म के दौरान वजन कम होना
- प्रीमैच्योर बच्चे
- पैदा होने के दौरान न रोने वाले बच्चे (दिमाग में हवा न जाने पर)
- पीलिया से ग्रसित
- जन्म के समय ज्यादा समय आईसीयू में रहना

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