मौत के बाद CBI की फाइलों में 10 साल जिंदा रहा आतंकी
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देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की मुस्तैदी की गजब कहानी सामने आई है। हिज्बुल मुजाहिदीन का जो आतंकी दस साल पहले लंदन में मर चुका है, सीबीआई की फाइलों में जिंदा रहा।
आतंकी की मौत के बारे में पूरी दुनिया जानती थी, लेकिन सीबीआई सोती रही। एक दिन अचानक इंटरनेट से आतंकी की मौत की जानकारी मिली तो एजेंसी हरकत में आई।
पेश मामला हिज्बुल मुजाहिदीन के मोहम्मद अयूब ठाकुर की मौत से जुड़ा है। उसकी लंदन के सेंट मैरी अस्पताल में दस मार्च 2004 को मौत हो गई थी। सीबीआई की फाइलों में यह आतंकी करीब दस साल तक जिंदा रहा। सीबीआई उसे ढूंढने में खाक छानती रही।
इंटरनेट के जरिए हुआ खुलासा
इंटरनेट से सीबीआई के अधिकारियों को 2013 में पता चला कि आतंकी की 2004 में मौत हो चुकी है। इसके बाद इंटरपोल से संपर्क साधा और ठाकुर की मौत की पुष्टि की।
इंटरपोल ने 13 मई 2014 के अपने पत्र में इस बात की पुष्टि की कि उसकी मार्च 2004 में अस्पताल में मौत हो चुकी है।
एजेंसी की मुस्तैदी का खुलासा तब हुआ जब अधिकारी ठाकुर के खिलाफ जारी दो गैर जमानती वारंट रद्द कराने कोर्ट पहुंचे। अदालत ने मोहम्मद अयूब ठाकुर के खिलाफ 11 मई 1993 को गैर जमानती वारंट जारी किया था। यह वारंट तामील होने के बाद नौ जून 1993 को वापस आना था।
कोर्ट में खामोश रह गई सीबीआई
कोर्ट ने ठाकुर के खिलाफ दोबारा 16 मई 1997 को भी गैर जमानती वारंट जारी किया था। यह वारंट तामील होने के बाद चार अगस्त 1997 को वापस आना था।
तीस हजारी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सीबीआई के आवेदन पर सुनवाई के बाद कहा कि ये दोनों वारंट समयबद्ध थे और तामील होने के बाद वापस आने थे, लेकिन सीबीआई ऐसा करने में नाकाम रही। एजेंसी ने इसके लिये कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया।
अदालत ने पूछा कि क्या सीबीआई को आतंकी की मौत की जानकारी दस साल बाद मिली। सर्वोच्च जांच एजेंसी से ऐसी खामी की उम्मीद नहीं की जाती।
CBI डायरेक्टर को दिया आदेश
अदालत ने कहा कि सीबीआई निदेशक को निर्देश दिया जाता है कि वह इसकी जांच करवाएं और इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें। पेश मामला हिजबुल मुजाहिदीन के खुफिया विंग के उप-प्रमुख अशफाक हुसैन लोन व आतंकियों की गिरफ्तारी से जुड़ा है।
अशफाक हुसैन नब्बे के दशक में चांदनी महल इलाके में चितली कबर इलाके में धार्मिक समारोह में शामिल होने आया था। पुलिस ने गुप्त जानकारी के आधार पर लोन व एक अन्य आतंकी को गिरफ्तार कर लिया था।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केएस मोही ने 1998 में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इस मामले में मोहम्मद अयूब ठाकुर व अन्य आतंकी गिरफ्तार नहीं हुए थे। ठाकुर किसी तरह लंदन भागने में कामयाब रहा था।