ब्रेट ली ने हंस फाउंडेशन की मुहिम को किया सलाम, बताया भारत के बच्चों को लेकर क्या है उनका ड्रीम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जन्मजात बहरेपन की बीमारी से जूझ रहे बच्चों के लिए द हंस फाउंडेशन व्यापक स्तर पर अभियान चलाता आ रहा है। 2013 में शुरू किए गए इस शानदार अभियान के तहत 0 से 3 साल के बच्चों के कॉकलीयर इम्प्लांट किए जाते हैं। फाउंडेशन अधिकतम 5 वर्ष तक के बच्चों की मदद करता है।
कॉकलीयर इम्प्लांट एक ऐसी सर्जरी है, जिसकी मदद से जन्मजात बहरेपन से जूझ रहे बच्चों को नया जीवन मिल सकता है। फाउंडेशन का मकसद ऐसे बच्चों की मदद करना है, जिनके माता-पिता उनके इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। इस बीमारी को लेकर जागरूकता फैलाने में ऑस्ट्रेलिया के अपने ज़माने के सबसे तेज़ गेंदबाज़ ब्रेट ली भी काम कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले ब्रेट ली भारत आए थे, इस दौरान अमर उजाला ने उनके साथ लंबी बातचीत की।
कॉकलीयर इम्प्लांट के बारे में बात करते हुए ब्रेट ली ने कहा कि सर्जरी इस पूरे प्रक्रिया का एक अंग है, इसके बाद भी कई महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट होते हैं, जिनमें स्पीच यानि भाषा की थैरेपी काफी अहम होती है। ब्रेटली ने कहा कि कॉकलीयर इम्प्लांट जितनी कम उम्र में हो उतना ज्यादा अच्छा रहता है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ब्रेट ली ने कहा कि द हंस फाउंडेशन न केवल सर्जरी में मदद करता है बल्कि फॉलोअप का भी पूरा ध्यान देता है।
कॉकलियर इम्प्लांट के लिए सबसे अहम है जल्दी इस तकलीफ को पहचानना और सही इलाज कराना। अगर आपको लगता है कि आपका बच्चा बहरपेन का शिकार है तो इंतजार मत कीजिए। भारत में जो भी बच्चा जन्म ले, उसका यूनिवर्सल न्यूबॉर्न स्क्रीनिंग हियरिंग (सुनने की शक्ति की जांच) टेस्ट से गुजरे, ताकि बीमारी की पहचान जल्द हो सके। अगर कोई दिक्कत बच्चे को है, द हंस फाउंडेशन उनकी मदद कर सकता है। द हंस फाउंडेशन इस दिशा में शानदार कार्य कर रहा है।
वे मूक-बधिर बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। ब्रेट ली ने कहा कि मैंने इस क्षेत्र में काम करने का फैसला किया, क्योंकि यह कार्य मेरे दिल के बेहदकरीब है। कॉकलीयर इम्प्लांट बेहद महंगा होता है, लेकिन इसका खर्च उठाना तो दूर की बात है बहुत से माता-पिता तो अपने बच्चों के लिए डिवाइस तक खरीद पाने में असमर्थ महसूस करते हैं। ऐसे लोगों की मदद के लिए द हंस फाउंडेशन बढ़चढ़ कर कार्य कर रहा है।
इस प्रोग्राम के तहत एक बच्चे के इम्प्लांट पर करीब 8 लाख रुपये का खर्च आता है। द हंस फाउंडेशन (THF) ने जन्मजात बहरेपन की बीमारी से जूझ रहे बच्चों के इलाज और कॉकलीयर इम्प्लांट के लिए गुड़गांव के कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल, नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल और नई दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल के साथ हाथ मिलाया है।