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Delhi NCR News: 70 वर्षीय ब्रेन डेड महिला के दोनों गुर्दे 56 वर्षीय मरीज में प्रत्यारोपित
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एम्स ने दूसरा ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट कर दिखाई नई राह
चंडीगढ़ से हेलिकॉप्टर से लाए गए गुर्दे, 12 घंटे के कोल्ड इस्केमिया टाइम के बावजूद दोनों किडनी ने तुरंत काम करना शुरू किया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।एम्स-दिल्ली के डॉक्टरों ने 70 वर्षीय ब्रेन डेड महिला के दोनों गुर्दों को 56 वर्षीय महिला मरीज में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया है। यह एम्स-दिल्ली में किसी सीमांत (मार्जिनल) डोनर से किया गया दूसरा ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट है। डॉक्टरों के अनुसार, इस तरह की प्रक्रिया से मृतक दाताओं से मिलने वाले अंगों के उपयोग का दायरा बढ़ाने और अंतिम चरण के गुर्दा रोग से जूझ रहे अधिक मरीजों को प्रत्यारोपण का अवसर देने में मदद मिल सकती है।
यह प्रत्यारोपण 28 जुलाई को एम्स के सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग ने नेफ्रोलॉजी, एनेस्थीसिया, ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी और ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन (ओआरबीओ) की टीमों के सहयोग से किया। डोनर को चंडीगढ़ के कमांड अस्पताल, चंडीमंदिर में ब्रेन डेड घोषित किया गया था। 70 वर्ष की उम्र के कारण उन्हें मार्जिनल या एक्सपैंडेड क्राइटेरिया डोनर की श्रेणी में रखा गया। आम तौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के दाताओं के अंगों को इस श्रेणी में माना जाता है।
एम्स के सर्जिकल विभाग के प्रोफेसर डॉ. असुरी कृष्ण ने बताया कि डोनर की अधिक उम्र और अन्य सीमांत विशेषताओं को देखते हुए दोनों गुर्दों को एक ही मरीज में प्रत्यारोपित करने का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य उपलब्ध अंगों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना था। दोनों गुर्दों को चंडीगढ़ से दिल्ली तक सेना के हेलिकॉप्टर से लाया गया। करीब 12 घंटे के कोल्ड इस्केमिया टाइम (ठंडे तापमान में प्रत्यारोपण तक सुरक्षित रखने का समय) के बावजूद प्रत्यारोपण के तुरंत बाद दोनों गुर्दों ने काम करना शुरू कर दिया।
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10 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी
56 वर्षीय महिला मरीज में दोनों गुर्दों को शरीर के दाहिने हिस्से में प्रत्यारोपित किया गया। डॉक्टरों के मुताबिक, मरीज की रिकवरी सामान्य रही और उसे 10 दिन बाद सामान्य किडनी फंक्शन के साथ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस टीम ने किया कमाल
इस पूरी प्रक्रिया में आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, दिल्ली और एम्स की विभिन्न टीमों के बीच बेहतर समन्वय रहा। एम्स के निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने प्रक्रिया में मार्गदर्शन और सहयोग दिया। ओआरबीओ के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर बलराम ने अंगों की व्यवस्था, संचार, रिट्रीवल और परिवहन से जुड़े समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रत्यारोपण टीम का नेतृत्व डॉ. असुरी कृष्ण ने किया। टीम में डॉ. सुशांत, डॉ. आदित्य बख्शी, डॉ. बृजेश कुमार सिंह और डॉ. मोहित सांगड़े शामिल रहे।
इसलिए दोनों गुर्दों का एक ही मरीज में प्रत्यारोपण
डॉ. कृष्ण के अनुसार, चयनित मार्जिनल डोनर से ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट मृतक दाताओं से मिलने वाले अंगों के उपयोग को बढ़ाने की महत्वपूर्ण रणनीति है। कुछ मामलों में दाता की अधिक उम्र या अन्य सीमांत विशेषताओं के कारण दोनों गुर्दों को अलग-अलग मरीजों में लगाने के बजाय एक ही मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे पर्याप्त किडनी फंक्शन हासिल करने के साथ उन अंगों का भी उपयोग संभव होता है, जिन्हें अन्यथा प्रत्यारोपण के लिए अस्वीकार किया जा सकता था।
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चंडीगढ़ से हेलिकॉप्टर से लाए गए गुर्दे, 12 घंटे के कोल्ड इस्केमिया टाइम के बावजूद दोनों किडनी ने तुरंत काम करना शुरू किया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।एम्स-दिल्ली के डॉक्टरों ने 70 वर्षीय ब्रेन डेड महिला के दोनों गुर्दों को 56 वर्षीय महिला मरीज में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया है। यह एम्स-दिल्ली में किसी सीमांत (मार्जिनल) डोनर से किया गया दूसरा ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट है। डॉक्टरों के अनुसार, इस तरह की प्रक्रिया से मृतक दाताओं से मिलने वाले अंगों के उपयोग का दायरा बढ़ाने और अंतिम चरण के गुर्दा रोग से जूझ रहे अधिक मरीजों को प्रत्यारोपण का अवसर देने में मदद मिल सकती है।
यह प्रत्यारोपण 28 जुलाई को एम्स के सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग ने नेफ्रोलॉजी, एनेस्थीसिया, ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी और ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन (ओआरबीओ) की टीमों के सहयोग से किया। डोनर को चंडीगढ़ के कमांड अस्पताल, चंडीमंदिर में ब्रेन डेड घोषित किया गया था। 70 वर्ष की उम्र के कारण उन्हें मार्जिनल या एक्सपैंडेड क्राइटेरिया डोनर की श्रेणी में रखा गया। आम तौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के दाताओं के अंगों को इस श्रेणी में माना जाता है।
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एम्स के सर्जिकल विभाग के प्रोफेसर डॉ. असुरी कृष्ण ने बताया कि डोनर की अधिक उम्र और अन्य सीमांत विशेषताओं को देखते हुए दोनों गुर्दों को एक ही मरीज में प्रत्यारोपित करने का निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य उपलब्ध अंगों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना था। दोनों गुर्दों को चंडीगढ़ से दिल्ली तक सेना के हेलिकॉप्टर से लाया गया। करीब 12 घंटे के कोल्ड इस्केमिया टाइम (ठंडे तापमान में प्रत्यारोपण तक सुरक्षित रखने का समय) के बावजूद प्रत्यारोपण के तुरंत बाद दोनों गुर्दों ने काम करना शुरू कर दिया।
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10 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी
56 वर्षीय महिला मरीज में दोनों गुर्दों को शरीर के दाहिने हिस्से में प्रत्यारोपित किया गया। डॉक्टरों के मुताबिक, मरीज की रिकवरी सामान्य रही और उसे 10 दिन बाद सामान्य किडनी फंक्शन के साथ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
इस टीम ने किया कमाल
इस पूरी प्रक्रिया में आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल, दिल्ली और एम्स की विभिन्न टीमों के बीच बेहतर समन्वय रहा। एम्स के निदेशक डॉ. निखिल टंडन ने प्रक्रिया में मार्गदर्शन और सहयोग दिया। ओआरबीओ के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर बलराम ने अंगों की व्यवस्था, संचार, रिट्रीवल और परिवहन से जुड़े समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रत्यारोपण टीम का नेतृत्व डॉ. असुरी कृष्ण ने किया। टीम में डॉ. सुशांत, डॉ. आदित्य बख्शी, डॉ. बृजेश कुमार सिंह और डॉ. मोहित सांगड़े शामिल रहे।
इसलिए दोनों गुर्दों का एक ही मरीज में प्रत्यारोपण
डॉ. कृष्ण के अनुसार, चयनित मार्जिनल डोनर से ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट मृतक दाताओं से मिलने वाले अंगों के उपयोग को बढ़ाने की महत्वपूर्ण रणनीति है। कुछ मामलों में दाता की अधिक उम्र या अन्य सीमांत विशेषताओं के कारण दोनों गुर्दों को अलग-अलग मरीजों में लगाने के बजाय एक ही मरीज में प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे पर्याप्त किडनी फंक्शन हासिल करने के साथ उन अंगों का भी उपयोग संभव होता है, जिन्हें अन्यथा प्रत्यारोपण के लिए अस्वीकार किया जा सकता था।