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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Blood tests and AI imaging are helping in the early detection of Alzheimer's.

Delhi NCR News: अल्जाइमर की जल्द पहचान में मददगार बन रहे ब्लड टेस्ट और एआई इमेजिंग

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 22 Sep 2026 08:44 PM IST
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विशेषज्ञ वेबिनार में बीमारी की जल्द पहचान और आधुनिक जांच तकनीकों की भूमिका पर चर्चाग
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। अल्जाइमर बीमारी की शुरुआती पहचान अब पहले के मुकाबले अधिक आसान और सटीक हो सकती है। ब्लड बायोमार्कर, एआई आधारित एमआरआई और एफडीजी पीईटी जैसी आधुनिक जांच तकनीकों से बीमारी से जुड़े बदलावों को शुरुआती चरण में पहचानने में मदद मिल रही है। यह जानकारी महाजन इमेजिंग एंड लैब्स की ओर से विश्व अल्जाइमर दिवस पर आयोजित विशेषज्ञ वेबिनार में दी गई।
वेबिनार का विषय ‘अल्जाइमर रोग: शुरुआती लक्षणों से लेकर जल्द निदान तक- समय पर इलाज में एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स की भूमिका’ था। इसमें अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत सूरी, महाजन इमेजिंग एंड लैब्स के संस्थापक एवं चेयरमैन डॉ. हर्ष महाजन, लैब डायरेक्टर डॉ. शैली महाजन और पीईटी सीटी एवं न्यूक्लियर मेडिसिन की डायरेक्टर डॉ. रितु वर्मा ने विचार रखे।
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विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार भूलना, रोजमर्रा के परिचित काम करने में परेशानी या ऐसे बदलाव, जिनसे व्यक्ति की आत्मनिर्भरता प्रभावित होने लगे, उन्हें सामान्य उम्र संबंधी भूलने की समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉ. विनीत सूरी ने कहा कि जांच का उद्देश्य केवल याददाश्त में कमी की पुष्टि करना नहीं, बल्कि इसके संभावित कारणों की पहचान करना भी है।
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ब्लड टेस्ट से जांच में मिल सकती है मदद
वेबिनार में पी-टाउ217/बीटा अमाइलॉइड1-42 ब्लड बायोमार्कर टेस्ट पर विशेष चर्चा हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह ब्लड सैंपल के जरिए अल्जाइमर से जुड़े जैविक बदलावों के संकेत देने में मदद कर सकता है। यह सीएसएफ जांच की तुलना में कम इनवेसिव विकल्प है। हालांकि, टेस्ट के परिणामों को मरीज के लक्षणों और अन्य जांचों के साथ मिलाकर देखना जरूरी है।
एमआरआई और पीईटी की भी भूमिका
एमआरआई से मस्तिष्क में संरचनात्मक बदलावों के साथ स्ट्रोक, ट्यूमर या अन्य समस्याओं की पहचान में मदद मिल सकती है। वहीं, एफडीजी पीईटी दिमाग के मेटाबॉलिज्म में बदलावों की जानकारी देता है। विशेषज्ञों ने कहा कि इन जांचों के परिणामों को मरीज की क्लिनिकल स्थिति और ब्लड बायोमार्कर के साथ मिलाकर समझना अधिक उपयोगी है।

इलाज के विकल्पों में भी बदलाव
विशेषज्ञों ने बताया कि डोनेपेजिल, रिवास्टिग्माइन, गैलेंटामाइन और मेमेंटाइन जैसी दवाएं लक्षणों को नियंत्रित करने में इस्तेमाल होती हैं। वहीं, लेकानेमैब और डोनानेमैब जैसी नई थेरेपी अमाइलॉइड पैथोलॉजी को लक्षित करती हैं। इनके इस्तेमाल के लिए मरीज का उचित चयन, बीमारी की पुष्टि और विशेषज्ञों की निगरानी जरूरी है।
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