ऐन वक्त पर भाजपा ने फिर खेला बड़ा 'दांव'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिल्ली भाजपा ने भले ही उपराज्यपाल से मिलकर विधानसभा चुनाव में ही जाने का अपना मत दिया है, लेकिन अपनी जुबानी कुछ भी कहने से सोमवार को दिनभर कतराती रही।
लुका-छिपी के इस खेल में कोई भी भाजपा नेता कुछ भी बोलने से परहेज करते दिखाई पड़े। यहां तक कि यह भी बताने में परहेज किया कि उनकी मुलाकात उपराज्यपाल से हुई है।
पार्टी रविवार रात को ही केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में यह तय कर चुकी थी कि एलजी के बुलावे पर प्रदेश भाजपा अपना क्या जवाब देगी, लेकिन इस निर्णय को पार्टी छिपाने के प्रयास में जुटी रही।
साफ नहीं है भाजपा का रुख
सोमवार सुबह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय और वरिष्ठ विधायक प्रोफेसर जगदीश मुखी ने उपराज्यपाल से मुलाकात की लेकिन देर शाम तक मीडिया से इस तथ्य को छुपाने में जुटे दिखें। यहां तक कि अधिकारिक बयान भी देर शाम तक नहीं दिया गया।
इतना ही नहीं, पंडित पंत मार्ग स्थित प्रदेश कार्यालय में मीडिया के जमावड़े की भी अनदेखी की गई और कोई नेता बयान देने नहीं पहुंचा। सोमवार रात 8 बजे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की ओर से तीन लाइनों में एक बयान आया कि प्रदेश भाजपा ने सरकार बनाने के मसले पर अपना रुख उपराज्यपाल के समक्ष रख दिया है।
यहां भी यह स्पष्ट नहीं किया गया कि सरकार भाजपा बनाएगी या चुनाव में जाएगी। उसके बाद रात 9 बजे फिर एक बयान आया कि पार्टी पिछले 8 दिसंबर से यह कहती रही है कि खरीद फरोख्त कर सरकार नहीं बनाएगी। केंद्रीय नेता राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू और डॉ हर्षवर्धन का भी शुरू से यही मत रहा है।
पहले से ही तैयार थी ये स्क्रिप्ट
दिल्ली में सरकार बनेगी या मध्यावधि चुनाव होगा, इस पूरे ड्रामे की स्क्रिप्ट पहले ही तैयार कर ली गई थी। केंद्रीय नेतृत्व ने ही यह तय कर दिया था कि मीडिया को किसी तरह की जानकारी उपलब्ध नहीं करानी है। उपराज्यपाल ही अधिकारिक बयान पेश करेंगे, हुआ भी यही।
लिहाजा यह कहने से गुरेज नहीं होगा कि प्रदेश भाजपा का रिमोट कंट्रोल कहीं और ही है। जैसे-जैसे बटन दबाया जाता है पार्टी का वैसी ही चाल चलती है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली की राजनीति पर नजर रखे हुए हैं।
क्या है रणनीति
पार्टी का मानना है कि पड़ोसी राज्य हरियाणा में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने से मतदाताओं का रुझान भाजपा की तरफ है। अगर भाजपा जम्मू-कश्मीर और झारखंड में भी बड़ी पार्टी के रूप में उभरती है तो इसका नि:संदेह फायदा दिल्ली में ही होगा।
लिहाजा पार्टी दिल्ली में चुनाव इन दोनों राज्यों के साथ नहीं कराना चाहती थी। लिहाजा चुनाव आयोग ने दिल्ली के तीन सीटों पर उपचुनाव की घोषणा कर दी। इस पूरी कहानी में भाजपा इस रणनीति में कामयाब हो गई कि दिल्ली में मध्यावधि चुनाव झारखंड और जम्मू-कश्मीर के साथ नहीं होगा। चुनाव का परिणाम आने के बाद ही हर हाल में चुनाव आयोग दिल्ली में चुनाव की घोषणा करेगा।
भाजपा को मिल सकता है ये फायदा
यूं तो विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में होने की कयासबाजी चल रही है, लेकिन यह चुनाव आयोग के फैसले पर टिका है। चुनाव आयोग अगर चाहे तो विधानसभा भंग करने के दिन से छह महीने तक का समय ले सकती है।
संविधान की इस प्रक्रिया से भाजपा को भी फायदा मिल सकता है। अगर झारखंड और जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं हुआ तो दिल्ली में अगर विधानसभा भंग हुई तो छह महीने तक और राष्ट्रपति शासन लागू रह सकता है।
प्रदेश भाजपा का एक घड़ा बड़ी ही सक्रियता के साथ दिल्ली में सरकार बनाने की दलील पेश कर रहा था। यह भी बयान आया कि केंद्र का निर्देश मिले तो 72 घंटे में सरकार बन सकती है। भाजपा विधायक चुनाव में जाने से बचना चाहते थे। केंद्रीय नेतृत्व से भी मुलाकात कर सरकार बनाने की दलील पेश करते रहे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के आगे प्रदेश के नेताओं की नहीं सुनी गई।