संघ के इशारे पर बीजेपी ने तोड़ दी अपनी परंपरा
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दिल्ली प्रदेश भाजपा में कई दिग्गज नेताओं को पीछे छोड़ सतीश उपाध्याय प्रदेश अध्यक्ष बनने में कामयाब हो गए। माना जा रहा है कि संघ मुख्यालय, झंडेवालान से उनके नाम पर पहले ही मुहर लग गई थी।
यही वजह है कि राष्ट्रीय भाजपा अध्यक्ष के नाम का ऐलान होने से पहले ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर दी गई। मंगलवार रात 10:55 पर अधिकारिक तौर पर प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा हुई।
दिल्ली भाजपा के नए मुखिया के ऐलान पर पार्टी ने सालों से चली आ रही अपनी परंपरा को तोड़ दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि यह काम संघ के इशारे पर हुआ है।
संघ की इस मेहरबानी की क्या है वजह?
लंबे इंतजार के बाद प्रदेश भाजपा को अध्यक्ष मिल गया। दौड़ में कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं के शामिल होने के बावजूद सतीश उपाध्याय को कुर्सी मिलने के पीछे का कारण उनका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा होना है।
यही वजह है कि सतीश का संघ से बहुत लंबा रिश्ता है। एबीवीपी में रहने के दौरान वह संघ के कार्यकर्ता रहे। संघ के आगे कई पूर्व अध्यक्षों के सुझाए गए नामों को भी दरकिनार कर दिया गया।
पार्टी नेताओं का कहना है कि अभी तक दिल्ली प्रदेश में वैश्य और पंजाबी समाज से ही अध्यक्ष चुने जाते थे। यहां की राजनीति में भी उन्हीं का दबदबा था, लेकिन इस बार पार्टी ने पहली बार ब्राह्मण पर दांव खेला है।
सीएम बनने की रेस में भी हुए शामिल
आमतौर पर दिल्ली के ही रहने वाले शख्स को प्रदेश अध्यक्ष चुना जाता था, लेकिन पहली बार आगरा (उत्तर प्रदेश) के मूल निवासी को भाजपा ने अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी है।
दरअसल, संघ और पार्टी ने सतीश उपाध्याय को यह जिम्मेदारी देकर पूर्वांचली वोटरों को अपने पक्ष में करने का कार्ड खेला है।
अभी तक सतीश उपाध्याय बतौर पार्षद ही जाने जाते थे, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद उनका कद बढ़ गया है। अब वे डॉ. हर्षवर्धन, प्रो. जगदीश मुखी, विजय गोयल की तरह ही मुख्यमंत्री प्रत्याशी की दौड़ में शामिल हो गए हैं।