अलविदा: कथक सम्राट बिरजू महाराज के गुणों का ग्राहक हर कोई रहा, कथक नृत्य को परिवार से निकालकर वैश्विक पहचान दिलाई
संगीत नाटक अकादमी द्वारा संचालित कथक केंद्र के निदेशक सुमन कुमार ने कहा कि गिनती की तिहाइयां बिरजू महाराज की अपनी उपज थी। वह जो कुछ भी देखते, उसे सरलतम रूप से कथक के रूप में प्रस्तुत कर देते। यही उनकी सबसे बड़ी काबिलियत थी, ऐसा करने की सामर्थ्य अन्य किसी गुरु में नहीं देखी।
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लखनऊ के अमीनाबाद में गोला गंज के पास झाऊलाल का पुल के नजदीक करीब आठ पीढ़ियों से एक पंडित परिवार कथक नृत्य सीखने-सिखाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा था। इसी परिवार में एक ऐसे बालक ने जन्म लिया, जिसने परंपरागत कथक नृत्य को एक परिवार से निकालकर इसे वैश्विक पहचान दिलाई। इसके लिए दुनिया ने इन्हें कथक सम्राट का दर्जा दिया। पद्म विभूषण, नृत्य शिरोमणि, संगीत नाटक अकादमी जैसे अनगिनत विभूतियों से सम्मानित पंडित बिरजू महाराज ने रविवार रात दिल्ली में आखिरी सांस ली। सोमवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होकर अनेक कलाकारों ने भारी मन के साथ उन्हें अंतिम बिदाई दी। सब के मुंह से एक वाक्य सामान्य रूप से निकल रहा था, कि बिरजू महाराज के गुणों का ग्राहक हर कोई रहा।
अंतिम संस्कार से पहले पंडित बिरजू महाराज के पार्थिव शरीर को शाहजहां रोड स्थित उनके आवास डी-2/33 पर रखा गया। पंडित बिरजू महाराज के पुत्र कथक गुरु पंडित जय किशन महाराज ने बताया कि लोधी रोड शमशान घाट ले जाने से पहले उनके पार्थिव शरीर को पंचशील मार्ग पर गुलमोहर पार्क में उनके द्वारा स्थापित स्कूल 'कलाश्रम' ले जाया गया। जहां कलाश्रम की स्थापना कर पंडित बिरजू महाराज आत्मसंतुष्ट हो गए थे। उनकी यह सबसे बड़ी इच्छा थी कि दिल्ली में एक ऐसा संस्थान बने, जहां निरंतर कथक की पाठशाला चलती रहे। उतर प्रदेश सरकार की ओर से लखनऊ स्थित उनके पुश्तैनी मकान को संग्रहालय का रूप दिए जाने से भी वह बेहद खुश थे, जहां लच्छू महाराज, शंभू महाराज से लेकर बाकी कथक गुरुओं ने शिक्षा-दीक्षा पाई।
गिनती की तिहाइयां उनकी उपज
संगीत नाटक अकादमी द्वारा संचालित कथक केंद्र के निदेशक सुमन कुमार ने कहा कि गिनती की तिहाइयां बिरजू महाराज की अपनी उपज थी। वह जो कुछ भी देखते, उसे सरलतम रूप से कथक के रूप में प्रस्तुत कर देते। यही उनकी सबसे बड़ी काबिलियत थी, ऐसा करने की सामर्थ्य अन्य किसी गुरु में नहीं देखी। आज विश्व भर में उनके शिष्य फैले हैं, जो उनकी बनाई तिहाइयां प्रस्तुत करते हैं। हर कोई उनके व्यक्तित्व का बखान करता है, सभी उनके गुणों के ग्राहक हैं।
दिल्ली को बनाई कर्मभूमि
बिरजू महाराज ने दिल्ली को अपनी कर्मभूमि बनाई। पिता के निधन के बाद वह 7-8 साल की उम्र में अपनी मां के साथ दिल्ली आ गए। यहां उनके दो चाचा पहले से रहते थे, जिनसे उन्हें कथक की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। कथक गुरु राजेंद्र कुमार गंगानी ने कहा कि बिरजू महाराज ने अपनी कला को सदैव ईश्वर माना। दिल्ली में उन्होंने पहली बार संगीत भारती में बच्चों को कथक सिखाना आरंभ किया। कुछ साल बाद दिल्ली कथक केंद्र की स्थापना हुई, तो वह इससे जुड़ गए। यहां करीब चार दशक तक उन्होंने हजारों शिष्यों को कथक सिखाया। यहां वह वर्ष 1998 तक कथक सिखाते रहे। वह कला के धनी व्यक्ति थे, वह रचनात्मक संगीतकार भी थे, तबला, हारमोनियम, नाल भी बजाते थे। साथ-साथ कविताएं लिखते और चित्रकारी भी करते थे। बीमारी के वक्त आखिरी बार जब उनसे मुलाकात हुई तब उनकी बातचीत से यही महसूस हुआ कि वह नहीं चाहते लोग जानें कि वह बीमार हैं।
पत्नी नहीं चाहती थीं वह फिल्मों में काम करें
पंडित जय किशन महाराज बताते हैं कि उनके दादा पंडित लच्छू महाराज ने फिल्मों में बहुत काम किया, लेकिन मां नहीं चाहती थी कि पंडित बिरजू महाराज फिल्मों के लिए काम करें। इसके बावजूद उन्होंने कुछ चुनिंदा फिल्मों में काम किया, जिनमें दिल तो पागल है, गदर और हाल ही में आई बाजीराव मस्तानी के लिए उन्होंने काम किया। इसके लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।
पंडितजी का शिष्य बनना सौभाग्य
पंडित बिरजू महाराज के दो पुत्र पंडित जय किशन महाराज और दीपक महाराज और तीन पुत्रियां कविता, ममता और अनीता हैं। इसके अलावा पंडित रागिनी महाराज पोती और त्रिभुवन महाराज उनके पोते हैं। यह सभी कथक गुरु के रूप में पहचान बना चुके हैं। पंडित जय किशन महाराज ने बताया कि उनका सौभाग्य है कि वह उनके पुत्र होने के साथ-साथ उनके शिष्य भी रहे।