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नवजात शिशुओं को मरने से बचा सकती है बायो मेडिकल रिसर्च : डॉ. मुंडेल
Tue, 30 Jul 2019 02:42 AM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vikas Kumar
Updated Tue, 30 Jul 2019 02:42 AM IST
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- फोटो : फाइल फोटो
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स्वास्थ्य के क्षेत्र में मौजूदा दुर्गम समस्याओं से निपटने के लिए दुनिया भर के देश जुटे हुए हैं, लेकिन भारत अगर चाहे तो इसमें काफी अहम मदद कर सकता है। दुनिया भर की आबादी का करीब 20 फीसदी हिस्सा भारत में रहता है। यहां के डॉक्टर, वैज्ञानिक और संस्थान विश्व स्तर पर चर्चित हैं। ऐसे में नवजात शिशुओं को मरने से बचाने में बायो मेडिकल रिसर्च को बढ़ावा देने जैसे विकल्प मौजूद हैं। यह कहना है बिल व मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के ग्लोबल हेल्थ अध्यक्ष डॉ. ट्रेवर मुंडेल का।
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सोमवार को एम्स के जेएलएन ऑडिटोरियम में बायो टेक्नोलॉजी मंत्रालय, बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंट काउंसिल (बीआईआरएसी) के संयुक्त तत्वावधान में परिचर्चा आयोजित की गई। दुर्गम स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में भारत की भूमिका पर बात करते हुए डॉ. मुंडेल ने कहा कि भारत मातृ एवं शिशु मृत्युदर में काफी अच्छा कार्य कर सकता है।
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दुनिया भर के देशों ने वर्ष 2030 तक इन मृत्युदर को नियंत्रण में लाने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में अगर भारत चाहता है कि मातृ मृत्युदर प्रति एक लाख पर 70 और शिशु मृत्युदर प्रति एक हजार पर 12 तक पहुंचे तो उसे मोबाइल फोन वीडियो आधारित मानवनिर्मित उपकरण की मदद लेनी चाहिए। इसके अलावा डॉ. मुंडेल ने टीबी को लेकर भी कुछ सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत साल 2025 तक टीबी यानि क्षयरोग मुक्त होने पर काम कर रहा है। जबकि पूरे देश के आगे टीबी के 10 लाख केस चुनौती हैं, जिनके बारे में सरकारी महकमे को भी जानकारी नहीं हैं। इसलिए टीबी के हरेक मरीज को उपचार देने के लिए इसकी रिपोर्टिंग को मजबूत करना जरूरी होगा।
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परिचर्चा के अंत में एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने बताया कि चिकित्सीय क्षेत्र में नई- नई तकनीकों के इस्तेमाल का एम्स हमेशा से पक्षधर रहा है। भारतीय तकनीकों को दुनिया के मंच पर लाने के उद्देश्य से ही एम्स कई नई तकनीकों को लेकर वैज्ञानिकों के साथ काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि आने वाले दिनों में एम्स आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तकनीक पर भी काम कर रहा है, जिसका इस्तेमाल मरीजों के इलाज से लेकर दस्तावेज और लैब इत्यादि की रिपोर्ट को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकेगी। इसके अलावा बायो और नैनो तकनीक पर भी एम्स काम कर रहा है। डॉ. गुलेरिया ने बताया कि नई तकनीकों की मदद से सस्ता उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में एम्स का पूरा फोकस है। परिचर्चा के दौरान बायोटेक्रोलॉजी मंत्रालय की सचिव डॉ. रेणु स्वरूप, एम्स की डीन डॉ. चित्रा सरकार, डॉ. मोहम्मद असलम भी मौजूद थे।