एमसीडी की गलफांस बना 80 लाख मीट्रिक टन कूड़ा, बिखरे तो 24 वर्ग किमी में एक फीट तक फैल जाए
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भलस्वा लैंडफिल साइट पर पिछले 50 वर्षों से कूड़ा इकट्ठा करने से न केवल प्रदूषण बढ़ रहा है बल्कि आसपास के क्षेत्रों में रहने वालों के लिए सिरदर्दी बन चुका है। अब तक यहां करीब 80 लाख मीट्रिक टन कूड़ा इकट्ठा होकर 62 मीटर ऊंचाई वाले पहाड़ का रूप ले चुका है। यह बिखर जाए तो 24 वर्ग किलोमीटर के दायरे में एक फुट ऊंचाई तक हर तरफ कूड़ा ही नजर आएगा। हालांकि लगातार गंभीर हो रही इस समस्या का हल ढूंढने में आईआईटी के विशेषज्ञ जुटे हैं और जल्द ही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी एमसीडी को सौंप दी जाएगी। कचरे से गैस उत्पादन की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।
भलस्वा लैंडफिल साइट पर कचरा भंडारण से होने वाली समस्याओं को दूर करने में अब तक सफलता नहीं मिल सकी है। बढ़ते प्रदूषण से प्रभावित हो रहे भूजल के कारण एमसीडी ने इसके अध्ययन की जिम्मेवारी आईआईटी दिल्ली को सौंपी है। डीपीआर में न केवल वैकल्पिक इंतजाम बल्कि इसे तैयार करने में होने वाले खर्च के अलावा गैस या कंपोस्ट से होने वाली आय सहित तमाम पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। इसी रिपोर्ट के आधार पर भलस्वा लैंडफिल साइट की समस्या को दूर किया जाएगा ताकि वर्षों से परेशानी झेल रहे दिल्ली वासियों को राहत मिल सके। उत्तरी दिल्ली नगर निगम क्षेत्र में रोजाना करीब 4000 टन कूड़ा इकट्ठा होता है, जिसे भलस्वा, नरेला और बवाना में डंप किया जाता है।
तलाशी जा रही है संभावनाएं
लैंडफिल साइट में पैदा हो रहे मीथेन को किस तरह उपयोगी बनाया जा सके, इसकी संभावनाएं तलाशी जा रही है। गैस, खाद और लीचेट सहित अन्य उत्पादों का कैसे इस्तेमाल किया जाए और प्रदूषित हो रहे भूजल को भी बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसकी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। डीपीआर सौंपने के बाद इस संबंध में टेंडर जारी किया जाएगा, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को भी आमंत्रित किया जा रहा है।