सावधान! बच्चों को नशेड़ी बना रहा है कफ सीरप
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किशोरों और युवाओं को कफ सीरप अपनी गिरफ्त में ले रहा है। कफ सीरप में करीब पांच एमएल में दस मिलीग्राम तक कोडीन होती है जो नशा करने में सहायक होता है।
कोडीन युक्त सीरप की बिक्री में पिछले तीन वर्षों से लगातार प्रति वर्ष 20 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। अगर अभिभावक समय रहते अपने बच्चों पर ध्यान न देंगे तो इनका भविष्य निश्चित रूप से खराब हो जाएगा।
सेक्टर-50 आरडब्ल्यूए के अध्यक्ष विमल शर्मा ने बताया कि , सेक्टर के बी ब्लॉक पार्क समेत अन्य पार्कों में शाम के बाद किशोर एवं युवा नशे का सेवन करते हैं। सुबह पार्कों में कफ सीरप की खाली बोतलें मिलती हैं। वहीं, जैन मंदिर के आगे खाली पड़े प्लाटों पर भी सुबह के समय कफ सीरप की खाली बोतलें मिलती हैं।
एक बार पी लिया तो फिर...
सेक्टर-62 स्थित फोर्टिस अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन के सीनियर कंसल्टेंट डॉ अजय अग्रवाल ने बताया कि, कफ सीरप में कोडीन फास्फेट के कारण नशा हो जाता है। एक बार पीने के बाद दोबारा सेवन की घोर इच्छा होती है और यह नशा बढ़ता ही रहता है।
अधिक मात्रा में पीने से ज्यादातर समय मरीज सोया रहता है। पिछले एक वर्ष में अस्पताल में सीरप का उपयोग कर इलाज के लिए आने वाले किशोर एवं युवाओं की संख्या बढ़ी है।
उन्होंने बताया कि डॉक्टरों के पर्चे पर ही इस तरह के कफ सीरप मेडिकल स्टोरों में उपलब्ध होते हैं। इन कफ सीरप पर लिखी मात्रा ही मरीजों को लेनी चाहिए। इससे अधिक मात्रा में कफ सीरप लेने पर यह शरीर को बेहद नुकसान पहुंचाता है।
व्हाइटनर की खुशबू में भी नशा
गौतमबुद्ध नगर के मेडिकल स्टोर एसोसिएशन के अध्यक्ष अनूप खन्ना ने बताया कि, जिले में पिछले तीन वर्षों से प्रति वर्ष इस तरह के कफ सीरप की बिक्री में लगातार 20 प्रतिशत तक इजाफा हो रहा है। बिना डाक्टरों के पर्चे के यह दवाइयां नहीं मिलती हैं।
इतना ही नहीं, व्हाइटनर की खुशबू से बच्चों में नशे की लत पड़ जाती है। दिल्ली-एनसीआर में कुछ बच्चों में व्हाइटनर सूंघने की आदत की बात पता चलने पर नोएडा के ज्यादातर स्कूलों ने व्हाइटनर स्कूल में लाने और उपयोग करने पर बैन लगा दिया।
एमिटी इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल रेनू सिंह ने बताया कि ,स्कूल में बच्चों को व्हाइटनर उपयोग करने पर पाबंदी लगाई गई है। इस तरह की चीजों से बचने के लिए बच्चों की काउंसिलिंग भी की जाती है।