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Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Arjan Singh's journey from the Air Force's sole Marshal to Lieutenant Governor remains inspiring today: Sandhu

वायुसेना के एकमात्र मार्शल से एलजी तक अर्जन सिंह का सफर आज भी प्रेरणादायक : संधू

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 26 Jun 2026 09:51 PM IST
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1965 के युद्ध के नायक और देश के एकमात्र मार्शल ऑफ द एयर फोर्स के गौरवशाली इतिहास को किया याद
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने शुक्रवार को मार्शल ऑफ द एयर फोर्स अर्जन सिंह मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए सरदार अर्जन सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। उपराज्यपाल ने कहा कि भारत माता के इस प्रतापी सपूत द्वारा कभी सुशोभित किए गए दिल्ली के उपराज्यपाल के पद पर आज सेवा करना उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने अर्जन सिंह के जीवन को स्वतंत्र भारत की यात्रा के महत्वपूर्ण क्षणों से जुड़ा हुआ बताया और उनके असाधारण सैन्य कॅरिअर व प्रशासनिक सेवा को राष्ट्र के लिए एक अमूल्य थाती करार दिया।


एलजी संधू ने 1965 के संघर्ष के दौरान उनके अनुकरणीय नेतृत्व को याद किया, जिसने भारतीय वायुसेना को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। राष्ट्र ने उनके इस योगदान को पद्म विभूषण से सम्मानित किया और बाद में उन्हें मार्शल ऑफ द एयर फोर्स के विशिष्ट पद से नवाजा गया, जो भारतीय इतिहास में अब तक केवल एक ही अधिकारी को प्राप्त हुआ है। इस मौके पर वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह, नौसेना स्टाफ के प्रमुख वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन, एयर फोर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया (रिटायर्ड), वरिष्ठ उपाध्यक्ष एयर मार्शल जगजीत सिंह व कई प्रतिष्ठित और एयर फोर्स एसोसिएशन के सदस्य भी उपस्थित रहे।
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वर्दी से कूटनीति और सार्वजनिक प्रशासन तक का बदलाव
एलजी संधू ने अर्जन सिंह के जीवन के उस पहलू पर विशेष फोकस किया, जहां उन्होंने सैन्य कमान से कूटनीति और सार्वजनिक प्रशासन में सहजता से प्रवेश किया। वायुसेना से सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने राजदूत और उच्चायुक्त के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1989-90 के दौरान दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दीं।
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औसत पायलट से मार्शल बनने का संघर्ष
1919 में लायलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे अर्जन सिंह का सफर आसान नहीं था। एलजी ने साझा किया कि उनके शुरुआती प्रशिक्षण के दौरान उनके फ्लाइंग मूल्यांकन को औसत बताया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा अभियान में उन्होंने अपनी कुशलता साबित की, जहां एक कठिन अभियान में उनके साथ गए 20 पायलटों में से केवल चार ही वापस लौटे थे। यह उनके धैर्य और दबाव में शांत रहने की क्षमता का ही परिणाम था कि उन्हें डि प्रतिष्ठित फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से सम्मानित किया गया।
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