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Delhi NCR News: एआई से आईवीएफ की गुणवत्ता में आएगा सुधार, घटेगा शिशु में रोग दर
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- विश्व आईवीएफ दिवस पर विशेष -
- रोग का निदान, प्रबंधन, पूर्वानुमान के साथ जटिलताओं को किया जा सकेगा कम, देर से शादी के कारण बढ़ रही महिलाओं में समस्या
- लेडी हार्डिंग अस्पताल में आने वाली हर तीसरी महिला में बांझपन की समस्या, आईवीएफ दिखता बेहतर विकल्प
राकेश शर्मा
नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। इस तकनीक से पैदा होने वाले शिशु में होने वाले रोग की आशंका भी कम होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनियाभर में आईवीएफ में एआई तकनीक को लेकर शोध चल रहे हैं। इसके परिणाम भी आने लगे हैं। भविष्य में भारत में भी इनका इस्तेमाल बढ़ेगा। एआई की मदद से संचालित उत्तेजना निगरानी, शुक्राणु विश्लेषण, निषेचन निगरानी, भ्रूण विकास, भ्रूण व्यवहार्यता मूल्यांकन, एंडोमेट्रियल विश्लेषण, गर्भावस्था की सफलता की भविष्यवाणी और डिम्बग्रंथि अतिउत्तेजना सिंड्रोम (ओएचएसएस) की जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। इसकी मदद से महिलाओं के गर्भधारण के स्तर में सुधार आएगा और आईवीएफ की मदद से महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकेंगी।
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में निदेशक प्रोफेसर डॉ. पिकी सक्सेना ने बताया कि आईवीएफ में एआई के इस्तेमाल से गुणवत्ता में सुधार आया है। दुनिया में आईवीएफ में एआई के इस्तेमाल से पहले बच्चे का जन्म भी हो चुका है। इसकी चर्चा दिल्ली प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों का संघ (एओजीडी) बुलेटिन में की है। उनका कहना है कि आईवीएफ से जन्में बच्चे में कई तरह के रोग होने की आशंका रहती है, लेकिन एआई इन रोगों को घटा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी महिला में कोई समस्या है तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
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महिलाओं पर रख सकेंगे नजर
तकनीक की मदद से महिलाओं में प्रजनन क्षमता, मासिक धर्म स्वास्थ्य, गर्भावस्था की निगरानी और रजोनिवृत्ति प्रबंधन सहित अन्य दिशा में काम किया जा सकेगा।
हर तीसरी महिलाओं में दिख रही समस्याएं
डॉ. सक्सेना ने बताया कि लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और श्रीमती सुचेता कृपलानी अस्पताल के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में इलाज करवाने आ रही करीब 30 फीसदी महिलाओं में बांझपन की समस्याएं दिख रही हैं। इन महिलाओं को इलाज के साथ आईवीएफ का विकल्प भी दिया जाता है। महानगर क्षेत्र में बढ़ती संख्या में एआई की मदद से आईवीएफ से महिलाओं के गर्भधारण के स्तर में सुधार आएगा। साथ ही पुरुषों के शुक्राणु का आकलन कर उसमें सुधार किया जा सकता है। इससे पैदा होने वाले बच्चे की गुणवत्ता बेहतर होगी। इसके लिए पीजीटी-ए जांच होती है। यह एक आनुवंशिक परीक्षण है जो इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) में भ्रूणों को स्थानांतरित करने से पहले किया जाता है, ताकि गुणसूत्रों की असामान्य संख्या (एनेप्लोइडी) का पता लगाया जा सके।
बांझपन के कारण
- देर से शादी - महानगरों में महिलाएं 30 से 35 की उम्र में शादी कर रही हैं। 35 की उम्र के बाद प्रजनन क्षमता तेजी से घटने लगती है। इस उम्र में अंडों की संख्या और गुणवत्ता दोनों घट जाती है।
- हार्मोनल असंतुलन - पीसीओएस के कारण अंडाशय में सिस्ट बनते हैं और ओवुलेशन बाधित होता है।
- थायरॉइड की समस्या - यह प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है।
- प्रोलैक्टिन हार्मोन का बढ़ना - ओवुलेशन को रोक सकता है।
- संक्रमण - पीआईडी से अंडाशय, गर्भाशय और ट्यूब्स को नुकसान हो सकता है।
- गलत जीवनशैली और आदतें
- मोटापा व अधिक या बहुत कम वजन
- धूम्रपान, शराब सेवन, अत्यधिक तनाव
- जंक फूड और फिजिकल एक्टिविटी की कमी
- प्रदूषण और रसायनों का दुष्प्रभाव
- अनुवांशिक कारण
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- रोग का निदान, प्रबंधन, पूर्वानुमान के साथ जटिलताओं को किया जा सकेगा कम, देर से शादी के कारण बढ़ रही महिलाओं में समस्या
- लेडी हार्डिंग अस्पताल में आने वाली हर तीसरी महिला में बांझपन की समस्या, आईवीएफ दिखता बेहतर विकल्प
राकेश शर्मा
नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है। इस तकनीक से पैदा होने वाले शिशु में होने वाले रोग की आशंका भी कम होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनियाभर में आईवीएफ में एआई तकनीक को लेकर शोध चल रहे हैं। इसके परिणाम भी आने लगे हैं। भविष्य में भारत में भी इनका इस्तेमाल बढ़ेगा। एआई की मदद से संचालित उत्तेजना निगरानी, शुक्राणु विश्लेषण, निषेचन निगरानी, भ्रूण विकास, भ्रूण व्यवहार्यता मूल्यांकन, एंडोमेट्रियल विश्लेषण, गर्भावस्था की सफलता की भविष्यवाणी और डिम्बग्रंथि अतिउत्तेजना सिंड्रोम (ओएचएसएस) की जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। इसकी मदद से महिलाओं के गर्भधारण के स्तर में सुधार आएगा और आईवीएफ की मदद से महिलाएं स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकेंगी।
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लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में निदेशक प्रोफेसर डॉ. पिकी सक्सेना ने बताया कि आईवीएफ में एआई के इस्तेमाल से गुणवत्ता में सुधार आया है। दुनिया में आईवीएफ में एआई के इस्तेमाल से पहले बच्चे का जन्म भी हो चुका है। इसकी चर्चा दिल्ली प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों का संघ (एओजीडी) बुलेटिन में की है। उनका कहना है कि आईवीएफ से जन्में बच्चे में कई तरह के रोग होने की आशंका रहती है, लेकिन एआई इन रोगों को घटा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी महिला में कोई समस्या है तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
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महिलाओं पर रख सकेंगे नजर
तकनीक की मदद से महिलाओं में प्रजनन क्षमता, मासिक धर्म स्वास्थ्य, गर्भावस्था की निगरानी और रजोनिवृत्ति प्रबंधन सहित अन्य दिशा में काम किया जा सकेगा।
हर तीसरी महिलाओं में दिख रही समस्याएं
डॉ. सक्सेना ने बताया कि लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और श्रीमती सुचेता कृपलानी अस्पताल के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में इलाज करवाने आ रही करीब 30 फीसदी महिलाओं में बांझपन की समस्याएं दिख रही हैं। इन महिलाओं को इलाज के साथ आईवीएफ का विकल्प भी दिया जाता है। महानगर क्षेत्र में बढ़ती संख्या में एआई की मदद से आईवीएफ से महिलाओं के गर्भधारण के स्तर में सुधार आएगा। साथ ही पुरुषों के शुक्राणु का आकलन कर उसमें सुधार किया जा सकता है। इससे पैदा होने वाले बच्चे की गुणवत्ता बेहतर होगी। इसके लिए पीजीटी-ए जांच होती है। यह एक आनुवंशिक परीक्षण है जो इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) में भ्रूणों को स्थानांतरित करने से पहले किया जाता है, ताकि गुणसूत्रों की असामान्य संख्या (एनेप्लोइडी) का पता लगाया जा सके।
बांझपन के कारण
- देर से शादी - महानगरों में महिलाएं 30 से 35 की उम्र में शादी कर रही हैं। 35 की उम्र के बाद प्रजनन क्षमता तेजी से घटने लगती है। इस उम्र में अंडों की संख्या और गुणवत्ता दोनों घट जाती है।
- हार्मोनल असंतुलन - पीसीओएस के कारण अंडाशय में सिस्ट बनते हैं और ओवुलेशन बाधित होता है।
- थायरॉइड की समस्या - यह प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है।
- प्रोलैक्टिन हार्मोन का बढ़ना - ओवुलेशन को रोक सकता है।
- संक्रमण - पीआईडी से अंडाशय, गर्भाशय और ट्यूब्स को नुकसान हो सकता है।
- गलत जीवनशैली और आदतें
- मोटापा व अधिक या बहुत कम वजन
- धूम्रपान, शराब सेवन, अत्यधिक तनाव
- जंक फूड और फिजिकल एक्टिविटी की कमी
- प्रदूषण और रसायनों का दुष्प्रभाव
- अनुवांशिक कारण