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दिल्ली फतह के बाद आप की राष्ट्रीय फलक पर विस्तार की योजना

Fri, 14 Feb 2020 05:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा शरद गुप्ता, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 14 Feb 2020 05:18 AM IST
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AAP plans to expand on national board
दिल्ली में जीत - फोटो : PTI

दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगभग पिछली बार जितनी ही धमाकेदार जीत दर्ज करने के बाद आम आदमी पार्टी अब दूसरे राज्यों का रुख भी करेगी। यही वजह है कि पार्टी अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल द्वारा पिछली बार की तरह इस बार भी अपने लिए कोई मंत्रालय नहीं लेने की संभावना है। उनकी सबसे अधिक प्राथमिकता आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाने की होगी।

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आम आदमी पार्टी ने पिछली बार गोवा और पंजाब के विधानसभा चुनाव लड़े थे। एक समय पंजाब में अच्छी स्थिति में आने के बावजूद उसे वहां  24 प्रतिशत वोट पाकर वहां की 117 में से महज 20 सीटें जीत पाई। लेकिन 24 प्रतिशत वोट पाकर वह 15 सीटों वाले अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को तीसरे स्थान पर धकेलने में कामयाब रही। इसी तरह गोवा में भले ही आपको 6.3 प्रतिशत वोट मिले लेकिन वह एक भी सीट जीतने में नाकामयाब रही।

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राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए आप को चार राज्यों में 6 प्रतिशत से अधिक वोट चाहिए। दिल्ली पंजाब और गोवा में उसे 6 फ़ीसदी से अधिक वोट मिल चुका है। लेकिन हरियाणा में वह 1 प्रतिशत वोट भी नहीं पा पाई। अब वह आगामी विधानसभा चुनाव पर नजर बनाए है।


इस वर्ष बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले वर्ष पश्चिम बंगाल, असम, केरल और जम्मू कश्मीर में। इनमें से आप केवल बिहार में चुनाव लड़ सकती है। चूंकि राजद और कांग्रेस दोनों ही बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है और नीतीश कुमार की जदयू और भाजपा के गठबंधन की सरकार के विपक्ष की जगह लगभग खाली है, इसीलिए आम आदमी पार्टी वहां चुनाव लड़ने की सोच सकती है।

वैसे भी पिछले महीने तक नीतीश कुमार के सलाहकार रहे प्रशांत किशोर अब आम आदमी पार्टी के साथ हैं। आप वहां कांग्रेस और राजद के साथ गठबंधन कर लड़ सकती है और उसके पास अकेले लड़ने का भी विकल्प खुला है। प्रशांत किशोर के पास बिहार के जिले ही नहीं ब्लॉक और तहसील स्तर तक के न सिर्फ आंकड़े मौजूद हैं बल्कि जदयू के महासचिव रहते ही उन्होंने एक समानांतर ढांचा भी तैयार कर लिया है।

छोटे राज्य हैं पसंद

पार्टी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों के बजाय गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और मणिपुर जैसे छोटे-छोटे राज्यों में चुनाव लड़ना ज्यादा पसंद करेगी। इन सभी राज्यों में सीधा मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच रहता है और उसमें एक तीसरी पार्टी के लड़कर जीतने की संभावना ज्यादा होती है। इनमें संसाधन भी कम लगते हैं। इन सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव 2022 में होने हैं।

इसलिए दिल्ली पर था फोकस
इसके बाद ही केजरीवाल ने बाकी राज्यों का सपना छोड़ सिर्फ दिल्ली पर फोकस करने का फैसला किया था। उस समय वे केंद्र और उपराज्यपाल के खिलाफ राज्य सरकार के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हो गया किस जमीन और पुलिस के अलावा किसी अन्य विषय की फाइल उपराज्यपाल के पास मंजूरी के लिए नहीं भेजी जाएगी। इसी के बाद केजरीवाल ने दिल्ली के विकास कार्यों को गति प्रदान की।

इसीलिए दिया राष्ट्र निर्माण का नारा
मंगलवार को दिल्ली चुनाव के नतीजे आने से पहले ही आप ने अपने राष्ट्रीय कार्यालय पर जुड़े राष्ट्र निर्माण के लिए बोर्ड लगाकर सदस्यता अभियान शुरू कर दिया था। मिस्ड कॉल के जरिए इस से 24 घंटे में 11 लाख लोग जुड़ चुके हैं।

गठबंधन में मुश्किल
आपका दूसरी पार्टियों के साथ सीटों का तालमेल कर लड़ना मुश्किल है क्योंकि कोई भी पार्टी अपनी सीटें इसे नहीं देना चाहती। सपा के नेता आपको दिल्ली जीत की बधाई तो देते हैं लेकिन कहते हैं कि इसका यूपी में स्वागत नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के नेता भी कहते हैं कि आप तो दिल्ली की पार्टी है और इसे वहीं लड़ना चाहिए।

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