जानिए, BJP के लिए कैसे मजबूरी बने चुनाव
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देश की सियासत में जोड़तोड़ की सरकार बनाना आम बात रही है। अमूमन दो विरोधी विचारधाराओं वाले नेता सत्ता पाने की गरज से जुगलबंदी करते दिखते भी हैं। लेकिन दिल्ली ने इस सियासी मिथ को तोड़ा है।
आठ महीने की सियासी उठापटक के बाद भी जोड़तोड़ की सरकार नहीं बन सकी। हैरत की बात यह कि पहली बार सियासत में कदम रखने वाली आम आदमी पार्टी (आप) के विधायकों ने भी पार्टी का दामन नहीं छोड़ा। इस बीच हालांकि खरीद-फरोख्त की कोशिशों के आरोप भी लगते रहे।
सियासी जानकारों को सबसे ज्यादा हैरानगी आप विधायकों की नेकनीयती पर जताते हैं। इसकी वजह यह रही कि आप के ज्यादातर विधायकों ने पहली बार सियासत में कदम रखा था।
इनमें से कइयों ने पार्टी की फंडिंग पर चुनाव लड़ा था। फिर, विधायक बनने से पहले इनके बीच आपसी समझ भी ज्यादा नहीं थी। ऐसे में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को छोड़कर किसी दूसरे विधायक का कद इतना ऊंचा नहीं हो सका, जो गुटबाजी करने में कामयाब हो सके।
विधायकों की मजबूरी थी साथ रहना!
बगैर किसी मजबूत नेता के दो तिहाई विधायकों का एक साथ टूटना नामुमकिन हो गया। इससे दलबदल कानून के तहत विधायकों की सदस्यता जाने का खतरा भी बना रहा। इससे चुनाव न चाहते हुए भी विधायक पार्टी के फैसले के साथ गए।
इसके अलावा मीडिया के जरिए विधायकों तक संदेश चला गया था कि पार्टी उनकी गतिविधियों पर नजर रख रही है। नाम उजागर न करने की शर्त पर विधायक इसे स्वीकार भी करते हैं।
दूसरी तरफ आप ने विपक्षी पार्टियों को निशाने पर ले रखा था। इसके लिए आप ने एक स्टिंग ऑपरेशन भी सार्वजनिक किया था। इसमें दावा किया गया था कि भाजपा नेता शेर सिंह डागर आप विधायक दिनेश मोहनिया को खरीदने की कोशिश कर रहे थे। इससे हर दल में संशय का माहौल था।
आप को तोड़ने में लगे थे उसी के MLA!
हालांकि, आप रणनीतिकारों का मानना है कि नए विधायकों के साथ सियासत के पारंपरिक तरीके कारगर साबित नहीं हो सके। फिर पार्टी ने लोकसभा चुनाव के बाद सभी विधायकों का सियासी गतिविधियों से जोड़े रखा। इसका सबसे अहम जरिया मोहल्ला सभाएं बनीं।
फिर, इसी बीच पार्टी के दूसरे आनुषंगी संगठन भी बनते रहे। इससे विधायकों को दूसरी तरफ सोचने का मौका कम ही मिला। साथ ही अरविंद केजरीवाल नियमित तौर पर सभी विधायकों से संवाद भी करते रहे। इससे पार्टी और नेता के साथ जुड़ाव बना रहा।
केजरीवाल ने भी माना कि देश में पहली बार कोई नया राजनीतिक दल टूट का शिकार नहीं बना। साथ ही यह आरोप भी लगाया कि विपक्षी पार्टियों को चार बार विधायकों को तोड़ने की कोशिश की। उनका चार-चार करोड़ रुपये का ऑफर भी काम नहीं आया। इसके लिए उन्होंने अपने विधायकों को बधाई भी दी।
दो सियासी विधायकों की राय जुदा
आप में आने से पहले सियासत में सक्रिय दो नेताओं का नाम खासा चर्चा में रहा। लक्ष्मी नगर से विधायक विनोद कुमार बिन्नी पहले पार्षद रह चुके थे। इनकी पार्टी से नहीं पटी। सरकार बनने के कुछ दिनों बाद ही पार्टी छोड़ दी।
दूसरा नाम रोहिणी से विधायक राजेश गर्ग का आता है। आप में आने से पहले वे कांग्रेस में सक्रिय थे। गर्ग अमूमन पार्टी के आला नेतृत्व के उलट राय रखने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि पार्टी ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की।