भ्रष्टाचार और लोकपाल से 'आप' ने मुंह मोड़ लिया है?
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पिछले साल दिल्ली विधान सभा के चुनावों के ठीक पहले आम आदमी पार्टी अपनी लोकप्रियता के चरम पर थी। अन्ना हजारे के जनलोकपाल पर किए गए व्यापक आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल ने इस आंदोलन को अमली जामा पहनाने के लिए ही राजनीतिक दल का गठन किया। इसे ही आज आम आदमी पार्टी के नाम से जाना जाता है।
इस आंदोलन की प्रमुख मांग थी कि देश में एक मजबूत और स्वायत्त लोकपाल की स्थापना की जाए जिसके पास प्रधानमंत्री सहित देश के किसी भी उच्च पदाधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने का अधिकार हो।
अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे के इस जनआंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। दिसंबर 2013 में दिल्ली में हुए चुनाव में अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने भष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया और इसके खात्मे के लिए जनलोकपाल को अंतिम समाधान बताया।
पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान इस बात का भी संकेत किया कि लोकपाल के मुद्दे पर न तो कांग्रेस गंभीर है न ही भारतीय जनता पार्टी इस पर कोई सख्त कदम उठाना चाहती है क्योंकि दोनों ही पार्टियां भ्रष्टाचार में डूबी हुई हैं।
जनलोकपाल के मुद्दे पर छोड़ी सत्ता
पिछले विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता को यह विश्वास दिलाने की पूरी कोशिश की कि असल में ये दोनों ही पार्टियां भष्टाचार में डूबी हुई हैं। यही कारण है कि दोनों ही पार्टियां मजबूत लोकपाल बिल पर आजादी के छह दशक बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी हैं।
हालांकि पिछले दिसंबर में हुए चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को गंभीरता से नहीं लिया। इसका नतीजा हुआ कि पार्टी पहले ही चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसे 28 सीटें मिलीं।
आप की इस सफलता ने सभी पार्टियों को चौंका दिया। इतना ही नहीं अपने पहले ही चुनाव के बाद दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार भी दिल्ली में बनी। हालांकि 49 दिन के भीतर ही जन लोकपाल पर केंद्र सरकार के रवैये के चलते आम आदमी पार्टी ने सरकार से इस्तीफा दे दिया।
कैंपेन से गायब लोकपाल और भष्टाचार
जहां पिछले चुनाव में आप का सबसे बड़ा मुद्दा भष्टाचार और जनलोकपाल था वहीं इस बार के चुनाव में अब तक पार्टी के किसी भी बड़े नेता ने इन दोनों ही मुद्दों पर कोई बयान नहीं दिया है।
नवंबर की शुरुआत में ही यह स्पष्ट हो गया कि दिल्ली में चुनाव ही अंतिम विकल्प है। इसके बाद पिछले कुछ दिनों से पार्टी ने दिल्ली में पोस्टर और होर्डिंग लगाने शुरु कर दिए हैं।
आप के पोस्टर कैंपेन में भी केजरीवाल सरकार के 49 बनाम मोदी सरकार के 150 दिन को ही सबसे बड़ मुद्दा बनाया गया है। हालांकि इस अभियान से भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधा निशान नहीं बनाना चाहती।
गौर करने वाली बात ये है कि आखिर क्यों जिस पार्टी ने अपने राजनीतिक अभियान की शुरुआत ही राजनीतिक भ्रष्टाचार से की थी वह इस चुनाव में इन मुद्दों पर उतनी उग्र या अराजक होती नहीं दिख रही है। न ही इसे अपने चुनाव अभियान के हिस्से में सबसे ऊपर रखती दिखाई दे रही है।
'अब नहीं करेंगे पहले जैसे गलती'
इसके अलावा पार्टी के अब तक के कैंपेन से साफ है कि वह इस चुनाव में बिजली, पानी और सुशासन को ही सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर पेश कर रही है।
दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने का मुद्दा भी इस बार के चुनावी अभियान में आप की रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है।
हालांकि खुद अरविंद केजरीवाल ही कई बार यह कह चुके हैं कि सरकार में रहने के दौरान उन्होंने कुछ गलतियां की हैं। इसके लिए उन्होंने औपचारिक तौर पर माफी भी मांगी है। अरविंद केजरीवाल ने जनता को भरोसा दिलाया है कि इस बार वह उन गलतियों को नहीं दोहराएंगे।